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22 अक्टू॰ 2020

मानव शरीर के अंग तन्त्र 2023|Human body system2021.

मानव शरीर के अंग तन्त्र 2023|Human body system2023:

हेलो भाई लोगों कैसे हो आप सभी आज हम मानव शरीर के अंग तंत्र के बारे में पढ़ने वाले हैं।

मानव शरीर में कौन-कौन से अंग तंत्र होते हैं?
अंग तंत्र के प्रकार?
पाचन तंत्र क्या है?
स्वसन तंत्र क्या है?
परिसंचरण तंत्र क्या है?
मस्तिष्क?
समन्वय तंत्र क्या है?
उत्सर्जन तंत्र?
रक्त परिसंचरण तंत्र?
प्रजनन तंत्र?
कंकाल तंत्र?


अंग तंत्र अंगों का एक समूह है जो एक कार्य विशेष को अकेले या समूहिक रूप से मिल कर करते हैं। मानव शरीर के विभिन्न अंग तंत्र हैं– पाचन तंत्र, परिसंचरण तंत्र, अंतःस्रावी तंत्र, उत्सर्जन तंत्र, प्रजनन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, श्वसन तंत्र, कंकाल तंत्र और मासंपेशी तंत्र।

इन अंगों के अलग अलग कार्य होते हैं लेकिन ये एक दूसरे से अलग होकर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते हैं| ये मानव शरीर में एक दूसरे से संपर्क में रहते हैं और अपने काम जैसे शरीर में हार्मोन्स के उत्पादन को विनियमित करने, शरीर की रक्षा और गतिशीलता प्रदान करने, शरीर के तापमान को नियंत्रित करने आदि के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

मानव शरीर के तंत्रः  

1. पाचन तंत्रः  

मानव पाचन तंत्र एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें बड़े जैविक तत्वों को छोटे कणों में तोड़ा जाता है जिसका प्रयोग शरीर ईंधन के तौर पर करता है। पोषक तत्वों को छोटे कणों में तोड़ने के लिए मुंह, पेट, आंतों और जिगर में उपस्थित विशेष कोशिकाओँ से निकलने वाले कई एन्जामों के समन्वय की आवश्यकता होती है। मानव पाचन तंत्र के विभिन्न अंगों का क्रम इस प्रकार हैः मुंह, ग्रासनली (भोजन नली), पेट, छोटी आंत और बड़ी आंत। मानव पाचन तंत्र से जुड़ी ग्रंथियां हैं– लार ग्रंथी, यकृत और अग्न्याशय।

पाचन प्रक्रिया में एन्जाइम् महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं औऱ पाचन की क्रिया मुंह में शुरु होती है एवं छोटी आंत में समाप्त होती है। बड़ी आंत में किसी प्रकार का पाचन कार्य नहीं होता है| इसमें उपस्थित जीवाणु विटामिन B और विटामिन K का उत्पादन करते हैं।



2. श्वसन तंत्रः  

भोजन से ऊर्जा निर्गमन करने की प्रक्रिया श्वसन कहलाती है। इसके अंतर्गत कोशिकाओं में ऑक्सीजन ग्रहण करना, उस ऑक्सीजन का इस्तेमाल भोजन को जलाकर ऊर्जा प्राप्त करने में करना और फिर शरीर से अपशिष्ट पदार्थ कार्बन–डाईऑक्साइड और पानी को बाहर निकालना शामिल है।


भोजन + ऑक्सीजन -------> कार्बन डाईऑक्साईड + पानी + ऊर्जा

श्वसन प्रक्रिया में ऊर्जा का निर्गमन शरीर की कोशिकाओं के भीतर होता है। इसके अलावा, जीवन के लिए श्वसन अनिवार्य है क्योंकि यह जीवों को जीवत रखने के लिए अनिवार्य सभी प्रक्रियाओं को करने के लिए ऊर्जा मुहैया कराता है।

बाहरी श्वसन

आंतरिक श्वसन

1. बाहरी श्वसन  फेफड़ों और रक्त में गैसों (O2,CO2) के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है।

1. आंतरिक श्वसन रक्त और कोशिकाओं के बीच गैसों के आदान–प्रदान की प्रक्रिया है।

2. बाहरी श्वसन के दौरान, ऑक्सीजन रक्त में जाता है और CO2 रक्त से बाहर निकलता है|

2. आंतरिक श्वसन के दौरान, रक्त द्वारा ले जाया जाने वाला ऑक्सीजन ऊतकों में जाता है और ऊतकों से CO2 बाहर निकलता है|

3. यह श्वसन का पहला चरण होता है।

3. यह श्वसन का दूसरा चरण होता है।

4. इसमें दो चरण होते हैं– सांस लेना और सांस छोड़ना|

4. इसमें कोई उपचरण नहीं होता है|

5. इस प्रक्रिया में रक्त में ऑक्सीजन बाहरी स्रोतों ( हवा/पानी) से पहुंचता है।

5. इस प्रक्रिया में ऊतक रक्त से ऑक्सीजन अवशोषित करते हैं।

6. इस प्रक्रिया में कार्बनडाईऑक्साइड ऊतक से निकलकर शरीर से बाहर चला जाता है।

6. इस प्रक्रिया में कार्बनडाईऑक्साइड ऊतक से निकलकर रक्त में जाता है।

श्वसन की प्रक्रिया में शामिल हैः शरीर में वायु लेना और बाहर निकालना; ऊर्जा पैदा करने के लिए वायु से ऑक्सीजन का अवशोषण; कार्बन डाईऑक्साइड का निस्तारण जो इस प्रक्रिया में उत्पाद के रूप में निकलता है|

12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों और व्यस्कों में श्वसन की सामान्य दर प्रति मिनट 14 से 18 श्वास होती है।

निःश्वसन: हवा को भीतर की ओर खींचना जिसके कारण वक्ष गुहा के आयतन में वृद्धि होती है।

उच्छ्श्वसन: हवा को बाहर निकलना जिसके कारण वक्ष गुहा के आयतन में कमी होती है।

जैविक विज्ञान में आविष्कार और खोज की सूची

श्वसन के प्रकार:

वायवीय/ऑक्सी श्वसन

अवायवीय/अनॉक्सी श्वसन

1. वायवीय श्वसन में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है|

1. अवायवीय श्वसन की क्रिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होती है|

2. अधिकांश पादप एवं जन्तु कोशिकाओं में वायवीय श्वसन की क्रिया होती है|

2. अवायवीय जीवाणु, यीस्ट की कोशिकाओं, प्रोकैरियोटीज और मांसपेशी कोशिकाओं में अवायवीय श्वसन की क्रिया होती है|

3. वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है| इसमें ग्लूकोज के 1 अणु से ATP के 38 अणु बनते हैं|

3. अवायवीय श्वसन वायवीय श्वसन की अपेक्षा कम प्रभावकारी होता है| इसमें ग्लूकोज के 1 अणु से ATP के 2 अणु बनते हैं|

4. वायवीय श्वसन की क्रिया सामान्यतः माइटोकॉन्ड्रिया में होती है|

4. अवायवीय श्वसन की क्रिया सामान्यतः कोशिका द्रव्य में होती है|

5. वायवीय श्वसन की क्रिया के अंत में उत्पाद के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड और जल प्राप्त होते हैं|

5. अवायवीय श्वसन की क्रिया के अंत में उत्पाद के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड और इथाईल एल्कोहल या लैक्टिक अम्ल प्राप्त होते हैं|

6. वायवीय श्वसन की क्रिया में उर्जा मुक्त होने में अधिक समय लगता है|

6. अवायवीय श्वसन की क्रिया बहुत कम समय में सम्पन्न होती है|

3. परिसंचरण तंत्र :

मनुष्यों में मुख्य परिसंचरण तंत्र 'रक्त परिसंचरण तंत्र' है। परिसंचरण तंत्र को द्वि परिसंचरण तंत्र भी कहा जाता है क्योंकि यह दो फंदों (लूप्स) से बना होता है और रक्त हृदय से होकर दो बार गुजरता है। हृदय इस तंत्र के केंद्र में होता है और दो भागों में बंटा होता है– दायां और बायां।

इस तंत्र में रक्त ऑक्सीजन, पचा हुआ भोजन और अन्य रसायनों जैसे हार्मोन एवं एन्जाइम को शरीर के अन्य हिस्सों में लेकर जाता है। साथ ही यह यकृत कोशिकाओं द्वारा उत्पादित अपशिष्ट या उत्सर्जक उत्पादों जैसे कार्बन डाईऑक्साइड और यूरिया को भी बाहर निकालने का काम करता है।

मानव के रक्त परिसंचरण तंत्र में हृदय (वह अंग जो रक्त को पंप करता है और पुनः प्राप्त करता है) और रक्त वाहिकाएं या नलिकाएं होती हैं जिसके माध्यम से शरीर में रक्त का प्रवाह होता है। रक्त तीन प्रकार की रक्त वाहिकाओं से प्रवाहित होती है:

(i) धमनियां

(ii) नसें और

(iii) केशिकाएं

परिसंचरण तंत्र की रक्त वाहिकाएं मनुष्य के शरीर के प्रत्येक अंग में मौजूद होती हैं। इनके द्वारा ही रक्त शरीर के सभी अंगों तक पहुंचता है।


4. नियंत्रण और समन्वय तंत्र :

उच्च श्रेणी के पशुओं जिन्हें कशेरुकी (मनुष्यों समेत) कहा जाता है, में नियंत्रण और समन्वय तंत्रिका तंत्र के साथ– साथ हार्मोन तंत्र जिसे अंतःस्रावी तंत्र कहा जाता है, के माध्यम से होता है।
   न्यूरॉन कोशिका

तंत्रिका कोशिकाओं से बने तंत्र को तंत्रिका तंत्र कहते हैं और इसका काम हमारे शरीर की गतिविधियों के बीच समन्वय स्थापित करना होता है। इसलिए, यह हमारे शरीर को मिलकर काम करने में मदद करता है। तंत्रिका तंत्र विशेष प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है जिसे न्यूरॉन्स कहते हैं। ये शरीर की सबसे बड़ी कोशिका होती है। तंत्रिका तंत्र के मुख्य अंग हैः मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसें। मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर की सभी इंद्रियों और अन्य अंगों से लाखों नसों से जुड़े होते हैं।


 मानव मस्तिष्क

विभिन्न प्रकार के अंतःस्रावी हार्मोन उत्पादित करने वाले अंतःस्रावी ग्रंथियों के समूह को अंतःस्रावी तंत्र कहते हैं। तंत्रिका तंत्र के साथ मिल कर अंतःस्रावी तंत्र हमारे शरीर की गतिविधियों के बीच समन्वय स्थापित करने में भी मदद करते हैं। हमारे शरीर में मौजूद अंतःस्रावी ग्रंथियां हैं– शीर्षग्रंथि, हाइपोथैलमस ग्रंथि, पिट्यूटरी ग्रंथि, थायराइड ग्रंथि, पाराथायराइड ग्रंथि, थैलमस, अग्न्याशय, अधिवृक्क ग्रंथि, वृषण (सिर्फ पुरुषों में) और अंडाशय (सिर्फ महिलाओं में)|



अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा उत्पादित हार्मोन हमारे शरीर के अंगों और तंत्रिका तंत्र के बीच संदेशवाहक का काम करते हैं।

मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र किस तरह से कार्य करता है?

5. उत्सर्जन तंत्र:

मनुष्यों में, एक अंग तंत्र द्वारा उत्सर्जन का कार्य किया जाता है, जिसे मूत्र तंत्र या उत्सर्जन तंत्र कहते हैं। इसमें निम्नलिखित अंग होते हैं– सेम के बीज के आकार के दो गुर्दे जो पेट के बीच के हिस्से के नीचे और पीछे की तरफ रहते हैं, दो उत्सर्जक नलियां या मूत्रवाहिनियां जो दोनों गुर्दे से जुड़े होते हैं, एक मूत्राशय जिसमें मूत्रवाहिनी खुलती हैं और एक मांसल नली जिसे मूत्रमार्ग कहते हैं जो मूत्राशय से निकलती है। मूत्रमार्ग के अंतिम सिरे पर मूत्रत्याग स्थान होता है। इसके अलावा, उत्सर्जन के दो मुख्य प्रक्रियाएं होती हैं– निस्पंदन और पुनः अवशोषण। दोनों गुर्दे न सिर्फ नाइट्रोजन वाले अपशिष्टों को बाहर निकालने का काम करते हैं बल्कि यह शरीर में पानी की मात्रा को विनियमित (परासरणनियमन– osmoregulation) भी करते हैं और रक्त में खनिजों का संतुलन समान्य बनाए रखते हैं। नेफ्रॉन गुर्दे का संरचनात्मक और कार्यात्मक हिस्सा होता है।

गुर्दे का काम विषैले पदार्थ यूरिया, अन्य अपशिष्ट लवणों और रक्त से अतिरिक्त पानी को बाहर करना और पीलापन लिए तरल मूत्र के रूप में उनका उत्सर्जन करना होता है।


6. प्रजनन तंत्र

एक ही प्रजाति के मौजूद जीवों से नए जीवों की उत्पत्ति को प्रजनन कहते हैं। पृथ्वी पर प्रजातियों के अस्तित्व के लिए यह अनिवार्य है। प्रजनन में जीव अपने माता– पिता के जैसे मूल गुणों के साथ पैदा होता है। जीवों में प्रजनन के दो मुख्य तरीके होते हैं:

(a) अलैंगिक प्रजनन

(b) लैंगिक प्रजनन

अलैंगिक प्रजनन: एकल जनक द्वारा यौन कोशिकाओं या युग्मक के सहयोग के बिना नए जीव को जन्म देना। उदाहरणः अमीबा में होने वाला द्विआधारी विखंडन, हाइड्रा में कोंपल निकला, राइजोपस कवक में बीजाणु का बनना, प्लानारिया (flarworm) में पुनर्जनन, स्पाइरोगाइरा में विखंडन, फूल वाले पौधों (जैसे गुलाब का पौधा) में वनस्पति विस्तार।


  अमीबा का द्विआधारी विखंडन

लैंगिक प्रजनन: दो जीवों, माता–पिता, द्वारा उनके यौन कोशिकाओं या युग्मकों का प्रयोग कर नए जीव को जन्म देना। यौन प्रजनन में शामिल दो जीव नर और मादा होते हैं।

  मनुष्यों में यौन प्रजनन

पुरुष प्रजनन प्रणाली

7. कंकाल तंत्र:

कंकाल तंत्र हड्डियों, उससे संबद्ध उपास्थियों और मानव शरीर के जोड़ों का तंत्र होता है। व्यस्क मानव शरीर में 206 हड्डियां होती हैं। हड्डियों के अलावा कंकाल में कार्टिलेज और लिगामेंट भी होते हैं।

कार्टिलेज सघन संयोजी ऊतक होते हैं जो प्रोटीन फाइबर से बने होते हैं और जोड़ों पर हड्डियों की गतिशीलता के लिए चिकती सतह मुहैया कराते हैं। लिगामेंट रेशेदार संयोजी ऊतक का बैंड है जो हड़्डियों को एक साथ जोड़े रखता है और उनके स्थान पर उन्हें बनाए रखता है। हालांकि जोड़ मानव कंकाल का महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि ये मानव कंकाल को गतिशील बनाता है। जोड़ "दो या अधिक हड्डियों", "हड्डियों और कार्टिलेज" एवं "कार्टिलेज और कार्टिलेज" के बीच हो सकता है।
{Post by Mr Sunil}


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21 अक्टू॰ 2020

श्वसन तंत्र क्या है?|और इसकी कार्यविधि और प्रकार2020|Respiratory system.

 श्वसन तंत्र  क्या है?|और इसकी कार्यविधि और प्रकार2020|Respiratory system.

हां तो  भाई लोग कैसे हो आप सब आज हम पढ़ने वाले हैं स्वसन तंत्र के बारे में।

स्वसन तंत्र क्या है?
स्वसन तंत्र की कार्य विधि?
और स्वसन तंत्र के प्रकार?
स्वसन तंत्र के प्रमुख अंग?
फेफड़े का कार्य?

श्वसन तंत्र :

श्वसन तंत्र या 'श्वासोच्छ्वास तंत्र' में सांस संबंधी अंग जैसे नाक, स्वरयंत्र (Larynx), श्वासनलिका (Wind Pipe) और फुफ्फुस (Lungs) आदि शामिल हैं। शरीर के सभी भागों में गैसों का आदान-प्रदान (gas exchange) इस तंत्र का मुक्य कार्य है।

मुख्य अंग:

नाक (Nose)
सांस लेने के दो रास्ते हैं- एक सही रास्ता दूसरा गलत रास्ता। नाक द्वारा सांस लेना सही रास्ता है किन्तु मुंह से सांस लेना गलत है। हमेशा नाक से ही सांस लेनी चाहिए क्योंकि नाक के अन्दर छोटे-छोटे बाल होते हैं। ये बाल हवा में मिली धूल को बाहर ही रोक लेते हैं, अन्दर नहीं जाने देते। मुंह से सांस कभी नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से हवा (सांस) के साथ धूल और हानिकारक कीटाणु भी अन्दर चले जाते हैं।

सांस-नली (Wind Pipe, Trachea)
यह प्राय: साढ़े चार इंच लम्बी, बीच में खोखली एक नली होती है, जो गले में टटोली जा सकती है। यह भोजन की नली (अन्न नाल) के साथ गले से नीचे वक्षगहर में चली जाती है। वक्षगहर में, नीचे के सिरे पर चलकर इसकी दो शाखाएं हो गई हैं। इसकी एक शाखा दाएं फेफड़े में और दूसरी बाएं फेफड़े में चली गई है। ये ही दोनों शाखाएं वायु नली कहलाती हैं। श्वास नली और वायु नली फेफड़े में जाने के प्रधान वायु पथ हैं।

स्वरयंत्र (Larynx)
स्वरयंत्र या र्लैरिंक्स (larynx), मनुष्यों और अन्य स्तनधारी जीवों के गले में मौजूद एक श्वसन अंग है जिसके प्रयोग से यह जीव भिन्न प्रकार की ध्वनियों में बोल पाते हैं। स्वरग्रंथि के अन्दर बहुत से स्वर-रज्जु (वोकल कार्ड) होते हैं। जब इन स्वर-रज्जुओं के ऊपर से हवा का तेज़ बहाव होता है तब इनकी कंपकंपी से अलग-अलग ध्वनियाँ पैदा होती है, ठीक उसी तरह जैसे किसी सितार की तारों के कंपन से विभिन्न सुरों का संगीत पैदा होता है।

श्वसन तंत्र के प्रमुख अंग:

जीभ के मूल के पीछे, कण्ठिकास्थि के नीचे और कण्ठ के सामने स्वरयंत्र (Larynx) होता है। नाक से ली हुई हवा कण्ठ से होती हुई इसी में आती है। इसके सिरे पर एक ढकंन-सा होता है। जिसे ‘स्वर यंत्रच्छद’ कहते हैं। यह ढकंन हर समय खुला रहता है किन्तु खाना खाते समय यह ढकंन बन्द हो जाता है जिससे भोजन स्वरयंत्र में न गिरकर, पीछे अन्नप्रणाली में गिर पड़ता है। कभी-कभी रोगों के कारण या असावधानी से जब भोजन या जल का कुछ अंश स्वरयंत्र में गिर पड़ता है तो बड़े जोर से खांसी आती है। इस खांसी आने का मतलब यह है कि जल या भोजन का जो अंश इसमें (स्वरयंत्र में) गिर पड़ा है, यह बाहर निकल जाए।

भोजन को हम निगलते हैं तो उस समय स्वरयंत्र ऊपर को उठता और फिर गिरता हुआ दिखाई देता है। इसमें जब वायु प्रविष्ठ होती है तब स्वर उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह हमें बोलने में भी बहुत सहायता प्रदान करता है।

फुफ्फुस (Lungs)
हमारी छाती में दो फुफ्फुस (फेफड़े) होते हैं - दायां और बायां। दायां फेफड़ा बाएं से एक इंच छोटा, पर कुछ अधिक चौड़ा होता है। दाएं फेफड़े का औसत भार 23 औंस और बाएं का 19 औंस होता है। पुरुषों के फेफड़े स्त्रियों के फुफ्फुसों से कुछ भारी होते हैं।

फुफ्फुस चिकने और कोमल होते हैं। इनके भीतर अत्यंत सूक्ष्म अनन्त कोष्ठ होते हैं जिनको ‘वायु कोष्ठ’ (Air cells) कहते हैं। इन वायु कोष्ठों में वायु भरी होती है। फेफड़े युवावस्था में मटियाला और वृद्धावस्था में गहरे रंग का स्याही मायल हो जाता है। ये भीतर से स्पंज-समान होते हैं।

श्वसन क्रिया (Respiration)
सांस लेने को ‘श्वास’ और सांस छोड़ने को ‘प्रश्वास’ कहते हैं। इस ‘श्वास-प्रश्वास क्रिया’ को ही ‘श्वसन क्रिया’ कहते हैं।

श्वास-गति (Breathing Rate)
साधारणत: स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में 16 से 20 बार तक सांस लेता है। भिन्न-भिन्न आयु में सांस संख्या निम्नानुसार होती है-

आयु -- संख्या प्रति मिनट

दो महीने से दो साल तक 35 प्रति मिनट

दो साल से छ: साल तक 23 प्रति मिनट

छ: साल से बारह साल तक 20 प्रति मिनट

बारह साल से पन्द्रह साल तक 18 प्रति मिनट

पन्द्रह साल से इक्कीस साल तक 16 से 18 प्रति मिनट

उपर्युक्त श्वास-गति व्यायाम और क्रोध आदि से बढ़ जाया करती है किन्तु सोते समय या आराम करते समय यह श्वास-गति कम हो जाती है। कई रोगों में जैसे न्यूमोनिया, दमा, क्षयरोग, मलेरिया, पीलिया, दिल और गुर्दों के रोगों में भी श्वास-गति बढ़ जाती है। इसी प्रकार ज्यादा अफीम खाने से, मस्तिष्क में चोट लगने के बाद तथा मस्तिष्क के कुछ रोगों में यही श्वास गति कम हो जाया करती है।

फेफड़े के कार्य:

दोनों फुफ्फुसों के मध्य में हृदय स्थित रहता है। प्रत्येक फुफ्फुस को एक झिल्ली घेरे रहती है ताकि फूलते और सिकुड़ते वक्त फुफ्फुस बिना किसी रगड़ के कार्य कर सकें। इस झिल्ली में विकार उत्पन्न होने पर इसमें शोथ हो जाता है जिसे प्लूरिसी नामक रोग होना कहते हैं। जब फुफ्फुसों में शोथ होता है तो इसे श्वसनिका शोथ होना कहते हैं। जब फुफ्फुसों से क्षय होता है तब उसे यक्ष्मा या क्षय रोग, तपेदिक, टी.बी. होना कहते हैं।

फुफ्फुसों के नीचे एक बड़ी झिल्ली होती है जिसे उर: प्राचीर कहते हैं जो फुफ्फुसों और उदर के बीच में होती है। सांस लेने पर यह झिल्ली नीचे की तरफ फैलती है जिससे सांस अन्दर भरने पर पेट फूलता है और बाहर निकलने पर वापिस बैठता है।

फेफड़ों का मुख्य काम शरीर के अन्दर वायु खींचकर ऑक्सीजन उपलब्ध कराना तथा इन कोशिकाओं की गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाईऑक्साइड नामक वर्ज्य गैस को बाहर फेंकना है। यह फेफड़ों द्वारा किया जाने वाला फुफ्फुसीय वायु संचार कार्य है जो फेफड़ों को शुद्ध और सशक्त रखता है। यदि वायुमण्डल प्रदूषित हो तो फेफड़ों में दूषित वायु पहुंचने से फेफड़े शुद्ध न रह सकेंगे और विकारग्रस्त हो जाएंगे।

श्वास-क्रिया दो खण्डों में होती है। जब सांस अन्दर आती है तब इसे पूरक कहते हैं। जब यह श्वास बाहर हो जाती है तब इसे रेचक कहते हैं। प्राणायाम विधि में इस सांस को भीतर या बाहर रोका जाता है। सांस रोकने को कुम्भक कहा जाता है। भीतर सांस रोकना आंतरिक कुम्भक और बाहर सांस रोक देना बाह्य कुम्भक कहलाता है। प्राणायाम ‘अष्टांग योग’ के आठ अंगों में एक अंग है। प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से फेफड़े शुद्ध और शक्तिशाली बने रहते हैं। फुफ्फुस में अनेक सीमांत श्वसनियां होती हैं जिनके कई छोटे-छोटे खण्ड होते हैं जो वायु मार्ग बनाते हैं। इन्हें उलूखल कोशिका कहते हैं। इनमें जो बारीक-बारीक नलिकाएं होती हैं वे अनेक कोशिकाओं और झिल्लीदार थैलियों के जाल से घिरी होती हैं। यह जाल बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य करता है क्योंकि यहीं पर फुफ्फुसीय धमनी से ऑक्सीजन विहीन रक्त आता है और ऑक्सीजनयुक्त होकर वापस फुफ्फुसीय शिराओं में प्रविष्ठ होकर शरीर में लौट जाता है। इस प्रक्रिया से रक्त शुद्धी होती रहती है। यहीं वह स्थान है जहां उलूखल कोशिकाओं में उपस्थित वायु तथा वाहिकाओं में उपस्थित रक्त के बीच गैसों का आदान-प्रदान होता है जिसके लिए सांस का आना-जाना होता है।
{Post by Mr Sunil}

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