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29 सित॰ 2020

Organic chemistry basic2020/कार्बनिक विज्ञान

Organic chemistry 2020:

Organic chemistry is the study of the structure, properties, composition, reactions, and preparation of carbon-containing compounds, which include not only hydrocarbons but also compounds with any number of other elements, including hydrogen (most compounds contain at least one carbon-hydrogen bond), nitrogen, oxygen, ...

B यौगिकों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें कार्बन के साथ-साथ हाइड्रोजन भी रहता है। ऐतिहासिक तथा परंपरागत कारणों से कुछ कार्बन के यौगकों को कार्बनिक यौगिकों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इनमें कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड प्रमुख हैं। सभी जैव अणु जैसे कार्बोहाइड्रेट, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, आरएनए तथा डीएनए कार्बनिक यौगिक ही हैं। कार्बन और हाइड्रोजन के यौगिको को हाइड्रोकार्बन कहते हैं। मिथेन (CH4) सबसे छोटे अणुसूत्र का हाइड्रोकार्बन है। ईथेन (C2H6), प्रोपेन (C3H8) आदि इसके बाद आते हैं, जिनमें क्रमश: एक एक कार्बन जुड़ता जाता है। हाइड्रोकार्बन तीन श्रेणियों में विभाजित किए जा सकते हैं: ईथेन श्रेणी, एथिलीन श्रेणी और ऐसीटिलीन श्रेणी। ईथेन श्रेणी के हाइड्रोकार्बन संतृप्त हैं, अर्थात्‌ इनमें हाइड्रोजन की मात्रा और बढ़ाई नहीं जा सकती। एथिलीन में दो कार्बनों के बीच में एक द्विबंध (=) है, ऐसीटिलीन में त्रिगुण बंध (º) वाले यौगिक अस्थायी हैं। ये आसानी से ऑक्सीकृत एवं हैलोजनीकृत हो सकते हैं। हाइड्रोकार्बनों के बहुत से व्युत्पन्न तैयार किए जा सकते हैं, जिनके विविध उपयोग हैं। ऐसे व्युत्पन्न क्लोराइड, ब्रोमाइड, आयोडाइड, ऐल्कोहाल, सोडियम ऐल्कॉक्साइड, ऐमिन, मरकैप्टन, नाइट्रेट, नाइट्राइट, नाइट्राइट, हाइड्रोजन फास्फेट तथा हाइड्रोजन सल्फेट हैं। असतृप्त हाइड्रोकार्बन अधिक सक्रिय होता है और अनेक अभिकारकों से संयुक्त हो सरलता से व्युत्पन्न बनाता है। ऐसे अनेक व्युत्पंन औद्योगिक दृष्टि से बड़े महत्व के सिद्ध हुए हैं। इनसे अनेक बहुमूल्य विलायक, प्लास्टिक, कृमिनाशक ओषधियाँ आदि प्राप्त हुई हैं। हाइड्रोकार्बनों के ऑक्सीकरण से ऐल्कोहॉल, ईथर, कीटोन, ऐल्डीहाइड, वसा अम्ल, एस्टर आदि प्राप्त होते हैं। ऐल्कोहॉल प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक हो सकते हैं। इनके एस्टर द्रव सुगंधित होते हैं। अनेक सुगंधित द्रव्य इनसे तैयार किए जा सकते हैं।

कार्बनिक यौगिकों में संयोजकता एवं समावयवता :


C6H12 के दो समावयव
संयोजकताएँ (जिनके द्वारा अणु में परमाणु एक दूसरे के साथ संबद्ध होते हैं) दो प्रकार की होती हैं : वैद्युत् संयोजकता (electrovalency) और सहसंयोजकता (covalency)। अकार्बनिक लवणों में अणु में परमाणु, या मूलक, बहुधा विद्युत्‌ संयोजकता द्वारा संबद्ध रहते हैं और ये अणु न केवल विलयनों में ही आयनों में विभक्त हो जाते हैं, बल्कि ठोस क्रिस्टलों में भी इनके आयन विशेष स्थिति में विद्यमान रहते हैं।

कार्बन परमाणु की बाह्यतम परिधि पर चार इलेक्ट्रॉन (.) हैं। यह अपने चारों ओर चार और इलेक्ट्रॉन लेकर अपना अष्टक पूरा कर सकता है। एक कार्बन परमाणु इस प्रकार चार हाइड्रोजनों से भी संयुक्त हो सकता है, या क्लोरीन के चार परमाणुओं से। यह संयोजन विद्युत्‌ संयोजन से भिन्न है। न तो कार्बन टेट्राक्लोराइड विलयनों में विभाजित होकर क्लोराइड आयन देता है और मेथेन विभाजित होकर हाइड्रोजन आयन। दो दो इलेक्ट्रॉनों के भागीदार बनने पर एक एक बंध बनता है। अत: कार्बन की सहसंयोजकता ४ है। कई कार्बन परमाणु भी सहसंयोजकताओं द्वारा आपस में उत्तरोत्तर क्रम से संयुक्त हो सकते हैं। इसी प्रकार साइक्लोपेंटेन, (C5H10), में ५ कार्बनों का बंद वलय और साइक्लोहेक्सेन, (C6H12), में ६ कार्बनों का बंद वलय है। कभी कभी अणुओं में असंतृप्त संयोजकताएँ होती हैं। यदि दो कार्बन परमाणुओं के बीच में ४ इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी हो, तो कहा जाएगा कि इनके बीच में एक द्विबंध है और ६ इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी हो तो कहेंगे कि इनके बीच में त्रिबंध हैं। एकबंध (:) द्विबंध (::) की अपेक्षा और द्विबंध त्रिबंध (:::) की अपेक्षा अधिक प्रबल है। जिन यौगिकों में द्विबंध हैं, वे अधिक अस्थायी और अधिक असंतृप्त हैं। बेन्ज़ीन, (C6H6), बाद वलय का एक यौगिक है। इसमें तीन द्विबंध भी माने जा सकते हैं, पर यह विशेष रूप से स्थायी है। इसके प्रत्येक दो कार्बनों के बीच का एक बंध अनुनादी माना जाता है, [2]जिसके कारण बेंजीन वलय को विशेष स्थायित्व प्राप्त होता है। इस प्रकार के अनुनादी गुणों के कारण ऐरोमैटिक नाभिक (जैसा बेन्ज़ीन में है) ऐलिफैटिक की अपेक्षा भिन्न समझे जाते हैं। कार्बनिक यौगिकों की विशेषता उनकी विस्तृत समावयता के कारण है। एक ही अणु के विभिन्न गुणवाले अनेक यौगिक होते हैं। साइक्लोप्रोपेन और प्रोपिलीन दोनों का एक ही अणु सूत्र (C3H6) है। दिग्विन्यास समावयता के कारण् भी कार्बनिक यौगिकों में बहुत भिन्नता पाई जाती है। मलेइक अम्ल (सिस रूप) और फूमैरिक अम्ल (ट्रान्स रूप) में इसी कारण अंतर है। दोनों अम्लों के भौतिक और रासायनिक गुणों में अंतर है। लैक्टिक अम्ल, (CH3. CH. OH. COOH) में एक असममित कार्बन परमाणु है। जिस कार्बन की चार संयोजकताओं से भिन्न भिन्न मूलक संयुक्त हों, वह असममित कार्बन कहलाता है। जिन अणुओं में इस प्रकार के असममित कार्बन होंगे, वे विलयनों और क्रिस्टनों में प्रकाश-घूर्णन प्रदर्शित करते हैं। इनके अणु दक्षिण-भ्रामी (द-) और वामी भ्रामी (वा-) और निष्क्रिय तीनों रूपों में पाए जा सकते हैं। ८ ऐल्डोपेंटोस और १६ ऐल्डो-हेक्से की कल्पना ही प्रस्तुत नहीं की, उन्हें पृथक्‌ करके उनका रचना विन्यास भी स्पष्ट कर दिया। ८ पेंटोस ये हैं : लिक्सोस, ज़ाइलो, ऐरेबिनोस और रिबोस और इन चारों के दक्षिणभ्रामी और वामभ्रामी दो दो रूप। ऐल्डोहेक्सोस में ४ असममित कार्बन हैं। अत: ये १६ प्रकार के होंगे। आठ दक्षिणभ्रामी और आठ वामभ्रामी (देखें कार्बोहाइड्रेट)। अणुओं की रचना तीनों विमाओं में प्रसारित हैं, न केवल दो विमाओं के धरातल में। इन संरचनाओं में अनेक प्रकार की समावयवताएँ संभव हैं और कार्बनिक रसायन के अध्ययन में इन सबका महत्व है।

प्रकार्यात्मक समूह (functional group) के आधार पर वर्गीकरण:

* चित्र:Alkyne general.svg
एल्काइन

* चित्र:Alcohol-(general)-skeletal.png
अल्कोहल

* चित्र:Ether-(general).png
ईथर

* चित्र:Amino-group-primary-2D-flat.png
अमीन

* चित्र:Aldehyde2.png
एल्डिहाइड

* चित्र:Ketony.svg
Cetona

* चित्र:Carboxylic-acid-skeletal.png
कार्बोक्सिलिक अम्ल

* चित्र:Ester-general.png
इस्टर

* चित्र:Carbamoyl-group-2D.svg
एमाइड

* चित्र:Azo-group.png
एजो

* चित्र:Nitro-group.png
नाइट्रो

* चित्र:Sulfoxide.png
सल्फोक्साइड


एक शाखित हाइड्रोकार्बन की संरचना तथा नामकरण 5-butil-3,9-dimetil-undecano

* कार्बनिक अभिक्रिया
* कार्बनिक रासायनिक अभिक्रियाओं की सूची
* कार्बनिक संश्लेषण

* Organic Chemistry on WikiChem
* MIT OpenCourseWare: Organic Chemistry I
* Organic Chemistry Lectures, Videos and Text
* Journal of Organic Chemistry (Table of Contents)
* Organic Letters (Table of Contents)
* Synlett
* Synthesis
* Organic Chemistry Portal - Recent Abstracts and (Name)Reactions
* Home of a full, online, peer-reviewed organic chemistry text.
* Virtual Textbook of Organic Chemistry
* Organic Chemistry Teaching kit
* Organic World Wide - A collection of Links
* Organic Families and Their Functional Groups
* Roger Frost's Organic Chemistry - multimedia teaching tools
* Organic chemistry help
* Chemical Freeware on http://www.acdlabs.com
* Organic Chemistry - Learning Resources
* Organic chemistry help-Best of the Web 2008


The following topic areas are the most basic concepts that a sucessful chemistry student needs to master:
  • Chemical Nomenclature(this unit required for credit)
  • Atomic Structure.
  • Periodic Table.
  • Lewis Structure.
  • Chemical Reactions.
  • Stoichiometry.
  • Acid-Base Chemistry.
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Chemistry for beginners2020./रसायनिक विज्ञान

रासायनिक विज्ञान(Chemistry for beginners2020)


The following topic areas are the most basic concepts that a sucessful chemistry student needs to master:
  • Chemical Nomenclature(this unit required for credit)
  • Atomic Structure.
  • Periodic Table.
  • Lewis Structure.
  • Chemical Reactions.
  • Stoichiometry.
  • Acid-Base Chemistry.

रसायन विज्ञान (अंग्रेज़ी:Chemistry) विज्ञान की एक प्रमुख शाखा है, जिसके अन्तर्गत पदार्थों के गुण, संघटन, संरचना तथा उनमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि रसायन विज्ञान का विकास सर्वप्रथम मिस्र देश में हुआ था। प्राचीन काल में मिस्रवासी काँच, साबुन, रंग तथा अन्य रासायनिक पदार्थों के बनाने की विधियाँ जानते थे तथा इस काल में मिस्र को केमिया कहा जाता था। रसायन विज्ञान, जिसे अंग्रेज़ी में 'केमिस्ट्री' कहते है की उत्पत्ति मिस्र में पायी जाने वाली काली मिट्टी से हुई। इसे वहाँ के लोग केमि कहते थे। प्रारम्भ में रसायन विज्ञान के अध्ययन को केमिटेकिंग कहा जाता था। रसायन विज्ञान के अन्तर्गत द्रव्य के संघटन तथा उसके अति सूक्ष्म कणों की संरचना का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त द्रव्य के गुण, द्रव्यों में परस्पर संयोग के नियम, ऊष्मा आदि ऊर्जाओं का द्रव्य पर प्रभाव, यौगिकों का संश्लेषण, जटिल व मिश्रित पदार्थों से सरल व शुद्ध पदार्थ अलग करना आदि का अध्ययन भी रसायन विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। आवर्त सारणी में सात क्षैतुज पंक्तियाँ होती हैं जिन्हें आवर्त कहते हैं। प्रीस्टले, शीले, व लेवायसिये ने रसायन विज्ञान के विकास में अत्यधिक योगदान दिया। लोवायसिये को तो आधुनिक रसायन विज्ञान का जन्मदाता भी कहा जाता है। कार्बनिक रसायन, जिसमें मुख्यतः कार्बन व उससे बनने वाले पदार्थों का अध्ययन किया जाता है, के विकास में कोल्वे, वोल्हार व पाश्तुर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

रसायन विज्ञान की मुख्यतः दो शाखाएँ है-


अकार्बनिक रसायन विज्ञान: इसके अंतर्गत सभी अकार्बनिक तत्त्वों एवं उनके यौगिकों का अध्ययन किया जाता है।
कार्बनिक रसायन विज्ञान: इसके अंतर्गत कार्बन के यौगिकों का अध्ययन किया जाता है।
रसायन विज्ञान के अध्ययन को सरल बनाने के लिए उसे कई शाखाओं में बाँटा गया है, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं-


भौतिक रसायन: इसके अंतर्गत रासायनिक अभिक्रिया के नियमों तथा सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।
औद्योगिक रसायन: इसमें पदार्थों का वृहत् परिमाण में निर्माण करने से संबंधित नियमों, अभिक्रियाओं, विधियों आदि का अध्ययन किया जाता है।


जैव रसायन: इसके अंतर्गत जीवधारियों में होने वाले रासायनिक अभिक्रिया तथा जन्तुओं एवं वनस्पतियों से प्राप्त पदार्थों का अध्ययन किया जाता है।
कृषि रसायन: इसके अंतर्गत कृषि से संबंधित रसायन जैसे जीवाणुनाशक, मृदा के संघटन आदि का अध्ययन किया जाता है।
औषधि रसायन: इसके अंतर्गत मनुष्य के प्रयोग में आने वाली औषधियाँ, उनके संघटन तथा बनाने की विधियों का अध्ययन किया जाता है।


विश्लेषिक रसायन: इसमें विभिन्न पदार्थों की पहचान, आयतन व मात्रा का अनुमान किया जाता है।
इतिहास
पंद्रहवीं-सोलहवीं शती तक यूरोप और भारत दोनों में एक ही पद्धति पर रसायन शास्त्र का विकास हुआ। सभी देशों में अलकीमिया का युग था। पर इस समय के बाद से यूरोप में[1] रसायन शास्त्र का अध्ययन प्रयोगों के आधार पर हुआ। प्रयोग में उत्पन्न सभी पदार्थों को तौलने की परंपरा प्रारंभ हुई। कोयला जलता है, धातुएँ भी हवा में जलती हैं। जलना क्या है, इसकी मीमांसा हुई। मालूम हुआ कि पदार्थ का हवा के एक विशेष तत्व ऑक्सीजन से संयोग करना ही जलना है। लोहे में जंग लगता है। इस क्रिया में भी लोहा ऑक्सीजन के साथ संयोग करता है। रासायनिक तुला के उपयोग ने रासायनिक परिवर्तनों के अध्ययन में सहायता दी। पानी के जल-अपघटन से हेनरी कैवेंडिश (1731-1810 ई.) ने 1781 ई. में हाइड्रोजन प्राप्त किया। जोज़ेफ ब्लैक (1728-1799ई.) ने कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बोनेटों का प्रयोग किए (1754 ई.)। जोज़ेफ प्रीस्टलि (1733-1804 ई.) शेले और लाव्वाज़्ये (1743-1794 ई.) ने 1772 ई. के लगभग ऑक्सीजन तैयार किया, राबर्ट बॉयल ने तत्वों की परिभाषा दी, जॉन डाल्टन (1766-1844 ई.) ने परमाणुवाद की स्पष्ट कल्पना सामने रखी, आवोगाद्रो 1776-1856 ई.), कैनिज़ारो (1826-1910 ई.) आदि ने अणु और परमाणु का भेद बताया। धीरे-धीरे तत्वों की संख्या बढ़ने लगी। अनेक धातु और अधातु तत्व इस सूची में संमिलित किए गए। बिखरे हुए तत्वों का वर्गीकरण न्यूलैंड्स (1963 ई.) लोथरमेयर (1830-1895 ई.) और विशेषतया मेंडेलीफ ने अनेक अप्राप्त तत्वों के संबंध में भविष्यवाणी भी की। बाद में वे तत्व बिलकुल ठीक वैसे ही मिले, जैसा कहा गया था। डेवी (1778-1829 ई.) और फैराडे 1791-1867 ई.) ने गैसों और गैसों के द्रवीकरण पर काम किया। इस प्रकार रसायन शास्त्र का सर्वतोमुखी विकास होने लगा।

रसायन विज्ञान का विकास
जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, रसायन विज्ञान का विकास भी उसी के साथ हुआ। प्रकृति में पाई पायी जाने वाली अगाध संपत्ति और उसका उपभोग कैसे किया जाए, इस आधार पर इसकी नींव पड़ी। घर, भोजन, वस्त्र, नीरोग रहने की आकांक्षा और आगे चलकर विलास की सामग्री तैयार करने की प्रवृत्ति ने इस शास्त्र के व्यावहारिक रूप को प्रश्रय दिया। अर्थर्वांगिरस ने इस देश में काष्ठ और शिलाओं के मंथन से अग्नि उत्पन्न की। अग्नि सभ्यता और संस्कृति की केंद्र बनी। ग्रीक निवासियों की कल्पना में प्रोमीथियस पहली बार अग्नि को देवताओं से छीनकर मानव के उपयोग के लिये धरती पर लाया। भारत में और भारत से बाहर लगभग सभी प्राचीन देशों, चीन, अरब, यूनान में भी मनुष्य की दो चिर आकांक्षाएँ थीं।

किस प्रकार रोग, जरा और मृत्यु पर विजय प्राप्त की जाय अर्थात संजीवनी की खोज या अमरफल की प्राप्ति
लोहे के समान अधम धातुओं को कैसे स्वर्ण के समान मूल्यवान धातुओं को कैसे स्वर्ग के समान मूल्यवान धातुओं में परिगत किया जाए।
मनुष्य ने देखा कि बहुत से पशु प्रकृति में प्राप्त बहुत सी जड़ी-बूटियाँ खाकर अपना रोग दूर कर लेते हैं। मनुष्य ने भी अपने चारों ओर उगने वाली वनस्पतियों की मीमांसा की और उनसे अपने रोगों का निवारण करने की पद्धति का विकास किया। महर्षि भरद्वाज के नेतृत्व में हिमालय की तलहटी में वनस्पतियों के गुणधर्म जानने के लिए आज से 2,5 00 वर्ष पूर्व एक महान संमेलन हुआ, जिसका विवरण चरक संहिता में मिलता है। पिप्पली, पुनर्नवा, अपामार्ग आदि वनस्पतियों का उल्लेख अथर्ववेद में है। यजुर्वेद में स्वर्ण, ताम्र, लोह, अपु या वंश तथा सीस धातुओं की ओर संकेत है। इन धातुओं के कारण धातुकर्म विद्या का विकास लगभग सभी देशों में हुआ। धीरे-धीरे इस देश में बारह से आया और माक्षिक तथा अभ्रक इस देश में थे ही, जिससे धीरे-धीरे रसशास्त्र का विकास हुआ। सुश्रुत के समय शल्यकर्म का विकास हुआ और वर्गों के उपचार के निमित्त क्षारों का उपयोग प्रारंभ हुआ और लवणों का उपयोग चरक काल से भी पुराना है। सुश्रुत में कॉस्टिक या तीक्ष्ण क्षारों को सुधा-शर्करा (चूने के पत्थर) के योग से तैयार करने का उल्लेख है। इससे पुराना उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। मयूर तुत्थ (तृतीया), कसीस, लोहकिट्ट सौवर्चल (शोरा), टंकण (सुहागा), रसक दरद शिलाजीत, गैरिक और वाद को गंधक के प्रयोग ने रसशास्त्र में एक नए युग को जन्म दिया। नागार्जुन पारद-गंधक-युग का सबसे महान रसवेत्ता है। रसरत्नाकर और (रसार्णव) ग्रंथ उसकी परंपरा के मुख्य ग्रंथ हैं। इस समय अनेक प्रकार की मूषाएं, अनेक प्रकार के पातन यंत्र, स्वेदनी यंत्र, बालुकायंत्र, कोष्ठी यंत्र और पारद के अनेक संस्कारों का उपयोग प्रारंभ हो गया था। धातुओं के भस्म और उनके सत्व प्राप्त करने की अनेक विधियाँ निकाली गई और रोगोपचार में इनका प्रयोग हुआ। समस्त भोज्य सामग्री का भी वात, कफ, पित्त निवारण की दृष्टि से परीक्षण हुआ। आसव, कांची, अम्ल, अवलेह, आदि ने रसशास्त्र में योग दिया।
भारत में वैशेषिक दर्शन के आचार्य कराणद ने द्रव्य के गुणधर्मों की मीमांसा की। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पंचतत्वों ने विचारधारा को इतना प्रभावित किया कि आजतक ये लोकप्रिय हैं। पंचज्ञानेंद्रियों के पाँच विषय थे। गंध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द और इनसे क्रमशः संबंध रखने वाले ये पाँच तत्व 'पृथिव्या-पस्तेजोवायुराकाश'[2] थे। (कणाद) भारतीय परमाणुवाद के जन्मदाता हैं। द्रव्य परमाणुओं से मिलकर बना है। प्रत्येक द्रव्य के परमाणु भिन्न-भिन्न हैं। ये परमाणु गोल और अविभाज्य हैं। दो परमाणु मिलकर द्वयरगुक और फिर इनसे त्रयतगुक आदि बनते हैं। पाक या अग्नि के योग से परिवर्तन होते हैं। रासायनिक परिवर्तन किस क्रम में होते हैं, इसकी विस्तृत मीमांसा कणाद दर्शन के परवर्ती आचार्यों ने की।

रसायन विज्ञान के अंग
इस पश्चिमी रसायन के दो उपांग थे: अकार्बनिक[3] और कार्बनिक।[4] शर्करा, वसा, मोम, फलों मे पाए जाने वाले अम्ल, प्रोटीन, रंग आदि सब सजीव रसायन के अंग थे। लोगों का विश्वास था कि ये पदार्थ प्रकृति स्वयं अपनी प्रयोगशाला में सजीव चेतना के योग से तैयार करती है और ये प्रयोगशाला में सजीव चेतना के योग से तैयार करती है और ये प्रयोगशाला में संश्लेषित नहीं हो सकते। रासायनज्ञों ने इन पदार्थों का विश्लेषण प्रारंभ किया। कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन, इन चार तत्वों के योग से बने हुए सहस्त्रों यौगिकों से रसायनज्ञों का परिचय हुआ। पता चला कि किसी यौगिकों को समझने के लिये केवल इतना ही आवश्यक नहीं है कि इस यौगिकों में कौन-कौन से तत्व किस अनुपात में हैं, यह भी जानना आवश्यक है कि यौगिकों के अणु में इन तत्वों के परमाणु किस क्रम में सज्जित हैं। इनका रचनाविन्यास जानना आवश्यक हो गया। फ्रैंकलैंड (1825-1897 ई.) ज़्हेरार लीबिख, द्यूमा, बर्ज़ीलियस आदि रसायनज्ञों ने इन यौगिकों में पाए जाने वाले मूलकों की खोज की जैसे मेथिल, एथिल, मेथिलीन, कार्बोक्सिल इत्यादि। इस प्रकार सजीव पदार्थों के आधार की ईटों का पता चल गया, जिनके रचनाविन्यास द्वारा विभिन्न यौगिकों की विद्यमानता संभव हुई। केकूले ने (1865 ई.) में खुली शृंखला के यौगिकों के साथ-साथ बंद शृंखला के यौगिकों ने कार्बनिक रसायन में एक नये युग का प्रवर्तन किया। नेफ्थालीन, क्विनोलीन, ऐंथ्रासीन आदि यौगिकों में एक से अधिक वलयों का समावेश हुआ। कार्बनिक रसायन का एक महत्त्वपूर्ण युग वलर की यूरिया- संश्लेषण- विधि से आरंभ होता है। 1828 ई. में उन्होंने अकार्बनिक या अजैव रसायन के ढंग की विधि से अमोनियम सायनेट, (NH4 CNO) बनाना चाहा। उसने देखा कि अमोनियम सायनेट ताप के भेद से अनुकूल परिस्थितियों में यूरिया (H2 N. CO. NH2) में स्वतः परिणत हो जाता है। अब तक यूरिया केवल जैव जगत का सदस्य माना जाता था। वलर ने अपने इस संश्लेषण से यह सिद्ध कर दिया कि जैव रसायन में जिन यौगिकों का प्रतिपादन किया जाता है, उनका भी संश्लेषण रासायनिक विधियों से प्रयोगशालाओं में हो सकता है। इस नवीन कल्पना ने जैव रसायन को एक नया रूप दिया। जैव रसायन मात्ररह गया और इसलिए अजैव रसायन को हम लोग अकार्बनिक रसायन कहने लगे। वैसे तो कार्बनिक और अकार्बनिक दोनों रसायनों के बीच का भेद अब सर्वथा मिट चुका है।

रसायन विज्ञान का क्षेत्र दूसरे विज्ञानों के समंवय से प्रति दिन विस्तृत होता जा रहा है। फलतः आज हम भौतिक एवं रसायन भौतिकी, जीव रसायन, शरीर-क्रिया-रसायन, सामान्य रसायन, कृषि रसायन आदि अनेक नवीन उपांगों के नाम भी सुनते हैं। विज्ञान का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें रसायन की विशिष्ट नवीनताओं का प्रस्फुटन न हुआ हो।

द्रव्य निर्माण के मूल तत्व
संसार में इतने विभिन्न पदार्थ इतनी विभिन्न विधियों से विभिन्न परिस्थियों में तैयार होते रहते हैं कि आश्चर्य होता है। जो भोजन हम ग्रहण करते हैं, वह शरीर में रुधिर, मांस, वसा विविध ग्रंथिरस, अस्थि, मज्जा, मलमूत्र आदि में परिणत होता है। भोज्य पदार्थ वनस्पतियों के शरीर में तैयार होते हैं। भोजन के सृजन और विभाजन का चक्र निरंतर चलता रहता है। यह सब बताता है कि प्रकृति कितनी मितव्ययी है। रासायनिक अभिक्रियाओं का आधार द्रव्य की अविनाशिता का नियम है। रसायनज्ञ इस आस्था पर अपने रासायनिक समीकरणों का निर्माण करता है कि द्रव्य न तो बनाया जा सकता है और न इसका विध्वंस/नष्ट हो सकता है।posted by mrSunil.


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