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14 जुल॰ 2023

मिशन चंद्रयान 3 की महत्वपूर्ण बातें 2023


मिशन चंद्रयान-3 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा भारतीय चंद्रमा मिशन का तीसरा मिशन है। यह मिशन चंद्रयान-2 के बाद आगे की उच्चतम सर्वोच्चता को प्राप्त करने का प्रयास है। यहां नीचे मिशन चंद्रयान-3 की कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:


मिशन का उद्देश्य: मिशन चंद्रयान-3 का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के पास वस्त्र मिश्रित पानी (वॉटर आइस) की खोज करना है। इसके अलावा यह मिशन चंद्रयान-2 द्वारा शुरू किए गए चंद्रमा के उपकरणों के आगे की खोज और तकनीकी प्रगति को भी बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।

अद्यतन किए गए प्रौद्योगिकी: मिशन चंद्रयान-3 में कई प्रौद्योगिकीयाँ मिश्रित की गई हैं। इसमें संकलन और प्रसंस्करण के लिए उपकरणों, स्वचालित अन्वेषण और प्राप्ति उपकरणों, नवीनतम नेविगेशन तकनीक, स्वचालित रूप से चंद्रमा की सतह को छूने वाले उपकरणों, और नई सूर्य चार्ज़ बैटरी तकनीक शामिल हैं।


चंद्रमा पर उपकरणों की ताकत: मिशन चंद्रयान-3 के तहत भारत चंद्रमा पर कई उपकरणों को भेजेगा जो विभिन्न परीक्षण और अनुसंधान कार्यों के लिए उपयोगी होंगे। इनमें शामिल हो सकते हैं उच्च-संकलन रेडार, ज़बरदस्ती रवाना करने वाला वाहन, सूर्य की किरणों को संग्रह करने का उपकरण, सतही विज्ञान और पाठशाला उपकरण, संगठित जनसंचार उपकरण, विज्ञान अध्ययन करने के लिए विज्ञान लैब आदि।

मिशन की योजना: मिशन चंद्रयान-3 में योजना यह है कि एक चंद्रमा रवाना करने वाली वाहन संचालित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न उपकरण स्थापित होंगे। चंद्रमा पर पहुंचने के बाद, उपकरणों को उनके कार्यों को पूरा करने के लिए सक्रिय किया जाएगा। इन उपकरणों का उपयोग चंद्रमा की सतह का मैपिंग, चंद्रमा के उपकरणों का अवलोकन, रोवर के माध्यम से नमूने के संग्रह और उपकरणों के बीच संचार जैसे कार्यों के लिए होगा।

मिशन चंद्रयान-3 भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है जो चंद्रमा के संबंधित अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में भारत को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।


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7 जून 2021

Know why this happens? 2023||ऐसा क्यों होता है?

Know why this happens? 2023||ऐसा क्यों होता है?

✔️जहां ज्यादा पेड़ ,वहां ज्यादा बारिश क्यों होती है?

हमारा पर्यावरण: 

कभी ना होगा अपना मंगल काट दिए जो हमने जंगल।।

नाचे मोर कोयल भी गाये आवो पर्यावरण बचाएं।।

प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) की प्रक्रिया मैं CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) लेने और ऑक्सीजन बाहर निकालने के दौरान पेड़ों और उनकी पत्तियां मैं मौजूद पानी वास पानी भाप बनकर उड़ता रहता है लेकिन यह प्रक्रिया हमें दिखाई नहीं देती ।
Know why this happens? 2021||ऐसा क्यों होता है?

तेज गर्मी पड़ने पर समुद्र नदी झील का पानी सूर्य की तपिश से वाष्प बनकर उड़ जाता है इसी वाष्पीकरण के कारण आसमान में बादल बनते हैं उन बादलों में पेड़ों से वाष्प बनकर उड़ने वाला पानी भी मिल जाता है इससे बादल भारी हो जाते हैं और बरस पड़ते हैं।
 इसीलिए जिस स्थान पर पेड़ ज्यादा होते हैं वहां पानी ज्यादा बरसता है।

अगर राजस्थान की बात करें तो राजस्थान राज्य में पेड़ों की कमी है इसीलिए वहां बादल तो बनकर उड़ते हैं लेकिन अक्सर पेड़ों द्वारा वाष्पीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के चलते बादल भारी नहीं होते और हवा के साथ आगे निकल जाते हैं माना जाता है कि जितने घने जंगल होते हैं वहां उतनी ज्यादा बारिश होती है।

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18 अप्रैल 2021

यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है2023?|Why sex education is necessary?

किशोरों के लिये यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है2023 ?

किशोरावस्था (10-19 वर्ष) वाल्यावस्था और वयस्कता के बीच की नाजुक अवस्था है । इस अवस्था में उत्तेजना, साहस, भावुकता और काम के प्रति उत्सुकता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। यदि इस अवस्था में होने वाले परिवर्तनों को सही तरीके से नहीं समझा जाये तो किशोर किशोरियाँ गलत रास्ते या भटकाव भरे जीवन में जा सकते है। अत: यौन शिक्षा के माध्यम से किशोरों को किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तनों, यौन एवं यौन संक्रमित रोगों की वैज्ञानिक जानकारी दी जाना आवश्यक है। जिससे उनका शरीर स्वस्थ्य रहे और वे अज्ञानता और भ्रमों से बच सकें।

प्रजनन स्वास्थ्य क्या हैं ?

आमतौर पर प्रजनन स्वास्थ्य का मतलब है, प्रजनन से संबंध रखने वाले सभी मामलों एवं अंगों का सही काम करना तथा उनके स्वस्थ्य रहने से है। साथ ही प्रजनन स्वास्थ्य में संतोषजनक और सुरक्षित लैंगिक जीवन, शिशु प्रसवन क्षमता और इस संबंध में स्वेच्छा से कब और कितने अंतराल पर ऐसा किया जाये, यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता शामिल है।

प्रजनन क्या हैं ?

सभी सजीव प्रजनन करते हैं। प्रजनन को उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके द्वारा कोई जीव अपनी जाति को बनाये रखता है। स्त्री और पुरूष प्रजनन प्रणाली का अंतर प्रजनन चक्र में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका के कार्य निष्पादन पर आधारित है।

मानव प्रजनन प्रक्रिया में दो तरह की लिंग कोशिकाएं संबद्ध है : पुरूष (शुक्राणु) और स्त्री (डिम्ब)। स्वस्था और लैंगिक दृष्टि से परिपक्व पुरूष लगातार शुक्राणु पैदा करते है। जब एक युवती स्त्री 12 या 13 वर्ष की तरूणावस्था को प्राप्त कर लेती है तो प्रत्येक 28 दिन के बाद उसे डिम्वाशय एकांतर रूप से एक डिम्ब विस्तृत करते करते है । यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक स्त्री का मासिक धर्म समाप्त नहीं हो जाता, सामान्यत: 50 वर्ष की उम्र तक।

स्त्री को अपने डिम्ब के गर्भधारण के लिए एक पुरूष की आवश्यकता होती है। शुक्राणु और डिम्ब, स्त्री की गर्भाशय नली में मिलते है और एक नये व्यक्ति की रचना आरंभ करते है। इसके बाद स्त्री उस संतान को गर्भावस्था से शिशुजन्म तक धारण करती है।

पुरूष और स्त्री के प्रजनन अंग और उनके कार्य ::पुरूष के प्रजनन अंग:

शिश्न (लिंग)(Penis)
पेशाव नली (मूल नलिका) (Urethra)
अंडकोष (Testes)
अंडकोश की थैली (Scrotum)
वीर्य नलिका
वीर्यकोष(Seminal Vesicles)

शिश्न (लिंग) :-
यह पुरूषों का वह अंग है, जो संभोग क्रियसा में कार्य करता है । इसमें मूत्र विसर्जन और वीर्यस्खलन का द्वार होता है ये दो क्रियाएं अलग-अलग समय पर ही हो सकती है। हर व्यक्ति के शिश्न की लंबाई अलग-अलग होती है, किन्तु इससे इसके कार्य का कोई संबंध नहीं होता।

मूत्र नलिका :-
शिश्न के अंदर एक पतली नली होती है, जो मूत्र नलिका या पेशाब की नली कहलाती है। इसके दो कार्य होते है। पहला संभोग के समय वीर्य का स्खलन और दूसरा शरीर से पेशाव निकलना।

अंडकोष :-
यह उसे गोलागार पिण्ड है। इनमें शुक्राणु बनते है, इसमें एक ग्रंथि होती है, ये ग्रंथियां पुरूष के खास हारमोन्स (एक प्रकार के रासायनिक पदार्थ) भी बनाती है। यह पुरूषों में पुरूषत्व वाले गुण पैदा करती है। जैसे-ढाढ़ी, मूँछ के बाल उगना, आवाज का भारी होना, आदि इन्हीं हारमोन्स के कारण होता है। इसका विस्तार विवरण किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तन के पृष्ठ में है।

अंडकोष की थैली :-
यह एक थैली होती है, जिसमें दोनों अंडकोष रहते है। यह शिश्न के पीछे तथा दोनों तरफ स्थित होती है।

वीर्य नलिकाएँ :-
यह संख्या में दो होती है दोनों अंडकोशों से एक-एक नलिका निकलती है और जाकर पेशाब की नली से मिल जाती है। यह नलिकाएॅं अंडकोष में बनने वाले शुक्राणु को पेशाब की नली तक ले जाती है। यह शरीर के अंदर होती है इसलिये बाहर से दिखाई नहीं देती। पुरूष में पेशाब और वीर्य को बाहर लाने का एक ही रास्ता है जबकि स्त्रियों में ऐसा नहीं होता उनके प्रजनन अंगों की संरचना अलग होती है।

पोस्ट्रेट ग्रंथी :-
इन ग्रंथियों में शुक्राणुओं के लिये द्रव होता है। यह शुक्राणुओं को पौस्टिक द्रव देती है। जो शुक्राशय में होता है।

स्त्री के प्रजनन अंग: -

भगशिशन (Clitoris)
योनि (Vagina)
योनि माग Z (Cervix)
गर्भाशय (Uterus)
डिम्ब नलिका (Fallopian Tube)
डिम्ब कोष

भगशिश्न :-
यह स्त्रियों के गुप्त अंग का एक बाहरी भाग है, यह छोटा, गोल-सा मटर के दाने के बराबर मांसपिंड होता है, जो पेशाब की नली के सुराख (छिद्र) के ऊपर होता है। यह संभोग के समय अत्यंत संवेदनशील हो जाता है और उत्तेजना पैदा करने का कार्य करता हैं।

योनि :-
योनि योनिद्वार के छिद्र बीच में उपस्थित होता है। एक ओर पेशाव के रास्ते और गुदा के बीच में योनिद्वार होता है। योनि एक झिल्लीयुक्त रास्ता है यह एक और तो बाहर की तरफ खुलता है, और दूसरी ओर गर्भाशय की गर्दन तक पहुंचता है योनि बहुत ही लचीली होती है इसका कार्य है, शिशु का जन्म तथा संभोग क्रिया।

योनि के कार्य :-
संभोग के दौरान पुरूष उत्तेजित शिश्न और वीर्य को प्राप्त करती है।
अशिशु जन्म के दौरान स्त्री के शरीर से शिशु के बाहर निकलने का रास्ता है।
मासिक स्राव के दौरान स्त्री के गर्भाशय से रक्तस्त्राव को शरीर से बाहर निकलने का रास्ता देती है।

योनि मार्ग :-
यह एक रास्ता या नाल है जो यानिक से गर्भाशय तक जाता है, और गर्भाशय के निचले हिस्से की रचना करता है।

गर्भाशय :-
यह मांसपेशियों से बना नाशपाती के आकार का एक खोखला अंग है। इसकी दीवारें बहुत मजबूत होती है। इसके अदर झिल्ली की एक तह (परत) होती है। जिसे एन्ड्रोमीट्रियम (Endometrium) कहते है। मासिक धर्म के समय झिल्ली की यह परत नष्ट होकर रक्त के साथ गिर जाती है और हर माह गर्भाशय एक नई परत बनाता है। गर्भावस्था में शिशु गर्भाशय के अंदर बनता और बढ़ता एवं नौ माह उपरांत शिशु का जन्म होता है। गर्भाशय की लंबाई 7.5 सेमी और चौड़ाई 5 सेमी. होती है।

डिम्ब नलिका :-
इन्हें डिम्ब नाल या बीज नाल भी कहा जाता है। यह दो होती है, स्त्री की डिम्ब इन्हीं नालों (Fallopian Tube) से होकर गर्भाशय में आती है।

डिम्बकोष:-
यह दो अंडाकार ग्रंथियॉं है। इनसे एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन नाम के दो हारमोन्स निकलते है जो स्त्रियों का खास हारमोन्स है। डिम्बकोष बारी-बारी हर महिने एक डिम्ब (अण्डाणु) पैदा करता है। यह डिम्ब डिम्बनाल के चौंडे कीप जैसे मुॅंह द्वारा अंदर ले लिया जाता है। यहॉं से यह गर्भाशय की ओर चल पड़ता है। यह प्रक्रिया डिम्ब-उत्सर्ग कहलाती है। इस यात्रा में अगर डिम्ब पुरूष के शुक्राणु से मिलता है तो स्त्री का गर्भ ठहर जाता है। डिम्ब और शुक्राणु का मिलन संभाग द्वारा होता है।
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17 फ़र॰ 2021

REET-2023 science model test paper

 

2 जन॰ 2021

एवियन इनफ्लुएंजा वायरस क्या है? यह कैसे फैलता है जानिए इसके लक्षण 2021

एवियन इनफ्लुएंजा वायरस

राजस्थान के झालावाड़ जिले में एक नया वायरस ने दस्तक दी है जिसके कारण आसपास के कई क्षेत्रों में पक्षियों की मौत का मामला सामने आया है जिसमें कौवे की मौतें हुई है।

यह पक्षियों के लिए सबसे ज्यादा घातक वायरस है इसके अलावा यह इंसानों के लिए भी घातक है जो लोग पक्षियों के संपर्क में रहते हैं यह वायरस इतना घातक है कि इससे मिलकर भी हो सकती है आपको बता दें बर्ड फ्लू का पहला मामला 1990 में सामने आया जब इंसानों में इस वायरस की पुष्टि की गई वैसे कुछ ही दिन में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को बर्ड फ्लू हुआ हो इसके अलावा अभी तक इंसानों से इंसानों में स्पश्ठ  नहीं है लेकिन यदि दो इंसानों के बीच व्यक्तिगत संपर्क हो जाए तो यह वायरस फेलता  है।

कुछ तरह (स्ट्रेन) के इन्फ़्लुएंज़ा वायरस, जो मुख्य रूप से पक्षियों को संक्रमित करते हैं, लेकिन ये मनुष्यों को भी संक्रमित कर सकते हैं.
इस तरह का फ्लू अक्सर ही बीमार पक्षियों के संपर्क में आने से होता है. यह व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी फैल सकता है।

एवियन इन्फ्लूएंजा

एवियन इन्फ्लूएंजा (एआई) को आमतौर पर बर्ड फ्लू (पक्षियों का वायरल रोग) के रूप में जाना जाता है। यह संक्रामण (इन्फ़ैकशन) इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है। वायरस संक्रमित पक्षी से मनुष्यों में फैलता है और बीमारी पैदा करता है। एवियन इन्फ्लूएंजा का संक्रमण घातक होता है और इससे मृत्यु होने की संभावना काफी अधिक होती है। इस घातक संक्रमण से ज्यादातर मुर्गियाँ, बतख और हंस प्रभावित होते हैं। पोल्ट्री पक्षियों में इसकी संवेदनशीलता काफी अधिक होती है। एवियन इन्फ्लूएंजा से पीड़ित अधिकतर लोगों को संक्रमित पक्षियों के साथ निकट संपर्क देखा गया था। यह संक्रमण हवा की बूंदों या धूल में पाए जाने वाले वायरस से भी फैलता है। यह सांस लेते समय लोगों के अंदर चला जाता है और लोगों को प्रभावित करता है। 

एवियन इन्फ्लूएंजा से पक्षी किस प्रकार संक्रमित होते हैं?

इस संक्रामण के जिम्मेदार वायरस, ऑर्थोमीक्सोविरिडा परिवार के इन्फ्लुएंजा ए जीनस से संबंधित है। दुनिया भर में, इस प्रकार का एक वायरस स्वाभाविक रूप से जलीय पक्षियों में पाया जाता है। संक्रमित पक्षी एवियन इन्फ्लूएंजा ए वायरस को अपनी लार, नाक स्राव और मल के जरिए अतिसंवेदनशील पक्षियों में संक्रमण फैला सकते हैं। LPAI (कम रोगजनक एवियन इन्फ्लुएंजा) HPAI (अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लुएंजा) की तुलना में कम संक्रामक है। HPAI वायरस शरीर के कई आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकता है और इसके कारण 48 घंटों के भीतर मृत्यु दर 90% -100% तक हो सकती है।

एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस के बारे में हम और क्या जान सकते हैं?

एवियन इन्फ्लुएंजा ए वायरस में महामारी इन्फ्लूएंजा उत्पन्न करने की क्षमता होती है इसलिए यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण विषय है। सबटाइप ए (H5N1) और ए (H7N9) ने लोगों में गंभीर संक्रमण पैदा किया है। दूसरी ओर, H7N3, H7N7 और H9N2 से भी लोग काफी मात्रा में संक्रमित हुए हैं।

लोग एवियन इन्फ्लूएंजा के संपर्क में कैसे आते हैं? 

एवियन इन्फ्लूएंजा ए वायरस व्यक्ति की आंख, मुंह या नाक के माध्यम से प्रवेश कर सकता है। संक्रमण तब हो सकता है जब वायरस हवा की बूंदों या धूल में होता है और व्यक्ति इसे सांस लेता है या किसी ऐसी चीज को छूता है जो इससे दूषित होती है। यह ज्यादातर तब होता है जब कोई व्यक्ति एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस से संक्रमित पक्षियों या सतहों के साथ असुरक्षित संपर्क में आता है।

एवियन इन्फ्लुएंजा वायरस कैसे फैलता है?


अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लूएंजा ए (H5N1) वायरस संभवतः निम्न तरीके से फैलता है:

👉पक्षी से लोगों में 
👉पर्यावरण से लोगों में 
👉एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में (बहुत कम/निरंतर)
👉लोगों में इसके फैलने का प्रमुख कारण संक्रमित पॉल्ट्री और दूषित सतह और वायु में वायरस का होना है

एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस के लिए रोग उत्पन्न करने की अवधि कितनी है?


डब्ल्यूएचओ के अनुसार वर्तमान डेटा निम्नलिखित तथ्यों के बारे में बताता है:

इन्फ्लुएंजा ए (H5N1) वायरस की रोग उत्पन्न करने की अवधि औसतन 2 से 5 दिन है और 17 दिनों तक रहती है।
इन्फ्लुएंजा ए (H7N9) वायरस रोग उत्पन्न करने की अवधि औसतन 5 दिन है और 1 से 10 दिनों तक रहती है।
स्वाइन इन्फ्लूएंजा वायरस रोग उत्पन्न करने की अवधि 2-7 दिनों तक है।

(Post by Mr Sunil)
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16 दिस॰ 2020

200+मसालों और कुछ औषधीय पौधों की वैज्ञानिक नाम।

मसाले और औषधीय पौधों के वैज्ञानिक नाम:

नमस्कार!
यहां पर मसालों और कुछ औषधीय पौधों की वैज्ञानिक नाम के बारे में बताने वाले हैं जो बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं जो विद्यार्थी विज्ञान विषय से संबंधित है उनको यह वैज्ञानिक नाम याद रखना चाहिए।
यह वैज्ञानिक नाम एग्जाम्स में बार-बार पूछे जा रहे हैं इसीलिए हमने आपके लिए कुछ आसान तरीके में वैज्ञानिक नाम को अलग-अलग करके लिखे हैं ताकि किसी भी विद्यार्थी को परेशानी ना हो।

मसालों के वैज्ञानिक नाम:-

लौंग                      साइजीजियम एरोमेरिकम
काली मिर्च              पाइपर नाईगरम
अदरक                   जिंजीबर ऑफाइसिनेल
हल्दी                      कुरकुमा लोंगा
जीरा                       क्यूमिनम सायमिनम
सोफ                     फनिकुलम वल्गर
हींग                      फेरुला आसाफॉयिटीडा

औषधीय पौधों की वैज्ञानिक नाम:-

नीम                    एजीडिरेक्टा इंडिका
चाय                   केमेलिया सायनेंसिस
कॉफी                 कोफिया अरेबिका
सर्पगंधा               रावल्फिया सरपेंटाइना
सिनकोना             सिनकोना स्पी.
धतूरा                 डटूरा स्ट्रेमोंनियम
सफेद मूसली        क्लोरोफाइट्स  बोरीविलीएनम
ईसबगोल             प्लांटेगो ओवेटा
अश्वगंधा              विथानिया सोमनिफेरा 
कुनेन                  सिनकोना स्पी.
टेक्सस                टेक्सस स्पी.

 (Post by Mr Sunil)

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(Mr Sunil Kumar)

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100+ जीवों और पादप के वैज्ञानिक नाम सबसे अधिक लोकप्रिय।

वैज्ञानिक नाम:

(Writer Mr.Sunil)

विभिन्न जीवों के स्थानीय साधारण नाम भिन्न स्थानों पर भिन्न-भन्न होते हैं।
 जो कि उनके अध्ययन को कठिन बना देते हैं।

जीवो की वैज्ञानिक नाम में प्रथम पद वंश का नाम होता है और दूसरा पद जाति का नाम या जाति संकेत पद होता है(लीनियस के अनुसार)
यह नाम लैटिन भाषा में लिखे जाते हैं क्योंकि यह मातृभाषा होती है और इसमें कोई परिवर्तन  नहीं होता है।


 
हम यहां पर प्लांट ओर एनिमल के कुछ उदाहरण ले रहे हैं:-


Scientific names:-

आम---मैग्नीफेरा इंडिका
धान---औरिजया सैटिवाट
गेहूँ---ट्रिक्टिकम एस्टिवियम
मटर---पिसम सेटिवियम
सरसोँ---ब्रेसिका कम्पेस्टरीज
मोर---पावो क्रिस्टेसस
हाथी---एफिलास इंडिका
डॉल्फिन---प्लाटेनिस्टा गैँकेटिका
कमल---नेलंबो न्यूसिफेरा गार्टन
बरगद---फाइकस बेँधालेँसिस
घोड़ा---ईक्वस कैबेलस
गन्ना---सुगरेन्स औफिसीनेरम
प्याज---ऑलियम सिपिया
कपास---गैसीपीयम


मुंगफली---एरैकिस हाइजोपिया
कॉफी---कॉफिया अरेबिका
चाय---थिया साइनेनिसस
अंगुर---विटियस
हल्दी---कुरकुमा लोँगा
मक्का---जिया मेज
टमाटर---लाइकोप्रेसिकन एस्कुलेँटम
नारियल---कोको न्यूसीफेरा
सेब---मेलस प्यूमिया/डोमेस्टिका
नाशपाती---पाइरस क्यूमिनिस
केसर---क्रोकस सैटिवियस
काजू---एनाकार्डियम अरोमैटिकम
गाजर---डाकस कैरोटा
अदरक---जिँजिबर ऑफिसिनेल
फुलगोभी---ब्रासिका औलिरेशिया
लहसून---एलियम सेराइवन
बाँस---बेँबुसा स्पे
बाजरा---पेनिसिटम अमेरीकोनम
लालमिर्च---कैप्सियम एनुअम
कालीमिर्च---पाइपर नाइग्रम
बादाम---प्रुनस अरमेनिका
इलायची---इलिटेरिया कोर्डेमोमम
केला---म्यूजा पेराडिसिएका
मुली---रेफेनस सैटाइविस
जामुन---शायजियम क्यूमिनी.
मनुष्य---होमो सैपियंस
मेढक---राना टिग्रिना
बिल्ली---फेलिस डोमेस्टिका
कुत्ता---कैनिस फैमिलियर्स
गाय---बॉस इंडिकस
भैँस---बुबालस बुबालिस
बैल---बॉस प्रिमिजिनियस टारस
बकरी---केप्टा हिटमस
भेँड़---ओवीज अराइज
सुअर---सुसस्फ्रोका डोमेस्टिका
शेर---पैँथरा लियो
बाघ---पैँथरा टाइग्रिस
चीता---पैँथरा पार्डुस
भालू---उर्सुस मैटिटिमस कार्नीवेरा
खरगोश---ऑरिक्टोलेगस कुनिकुलस. 
हिरण---सर्वस एलाफस
ऊँट---कैमेलस डोमेडेरियस
लोमडी---कैनीडे
लंगुर---होमिनोडिया
बारहसिँघा---रुसर्वस डूवासेली
मक्खी---मस्का डोमेस्टिका


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15 दिस॰ 2020

कोशिका सिद्धांत (Cell Theory) क्या है जानें आसान तरीके से।

कोशिका सिद्धांत (Cell Theory)

Cell theory: 



*कोशिका सिद्धांत मैथियास जैकब श्लाइडेन (Mathias Jacob Scliden, 1838) व थियोडोर श्वान (Theodore Schwann, 1839) ने दिया। 


* उन्होंने कहा की पादपों तथा जंतुओं का शरीर कोशिका तथा कोशिका के उत्पादों से मिलकर बने है।



*सर्वप्रथम रुडोल्फ विर्चो (Rudolf Virchow) ने बताया की ओमनिस सेलुला–इ–सेलुला (Omnis Cellulaie Cellula means all cells arise from pre-existing cells ) अथार्त कोशिका विभाजित होती है।



* और नई कोशिकाओं की उत्पति पूर्ववर्ती (pre-exiting) कोशिकाओं के विभाजन से होती है।

*आधुनिक कोशिका सिद्धांत (Modern cell theory)


रुडोल्फ विर्चो (Rudolf Virchow) ने श्लाइडेन व श्वान के इस सिद्धांत में बदलाव कर नया कोशिका सिद्धांत प्रतिपादित की, जिसे आधुनिक कोशिका सिद्धांत (Modern cell theory) कहते है।

 जिसके अनुसार-

*प्रत्येक सजीव का शरीर एक या अधिक कोशिकाओं से बना होता है।



*कोशिका सजीवों की संरचनात्मक एंव क्रियात्मक इकाई (Structural and functional unit) है।



*सभी कोशिकाओं आधारी रूप से (basically) एक समान होती हैं। जिसमें जीवद्रव्य (Cytoplasm), केन्द्रक (Nucleus) एवं कोशिकांग (Organelles) होते है।



*कोशिका पर पतली कोशिका झिल्ली (Cell memberane) एवं कोशिका भित्ति (Cell wall) का आवरण होता है।

* कोशिका भित्ति केवल पादप कोशिकाओं (Plant cells) में पाई जाती है, प्राणी कोशिकाओं (Animal cells) में नहीं पाई जाती है।



*सभी कोशिकाओं का रासायनिक संगठन (Chemical compostion) एंव उपापचयी क्रियाएँ (Metabolic reaction) एक समान होती हैं। 



*इसलिए कोशिका को सजीवों की क्रियात्मक इकाई (Functional unit) कहा जाता है।



*नईकोशिकाएँ पूर्ववर्ती कोशिकाओं के विभाजन से बनती है।



*कोशिकाआनुवंशिक पदार्थ उपस्थित होता है जो एक सन्तति से दूसरी सन्तति में वंशागत होता है। इसलिए कोशिका को वंशागति की इकाई  (unit of heredity) कहा जा सकता है।

*कोशिका सिद्धांत के अपवाद (Exeption of Cell Theory)


कोशिका सिद्धांत के अपवाद  निम्न  है-

(I) विषाणु (Virus) 

8*वायरस अकोशिकीय होते है इनमें केवल न्यूक्लिक अम्ल  (DNA अथवा RNA) और प्रोटीन  होता है।



(II) विषाणु कण/ विरोइडस (Viriods)

विरोइडस केवल आरएनए कण को कहा जाता है।



(III) विरिओन (Virions) 

ये विषाणुविय जीनोम के निष्क्रिय वाहक (Inactive carrier) होते हैं।



(IV) प्रीओन (Prions)

ये विषाणु का बाहरी केवल प्रोटीन का आवरण होता है  इनमें न्यूक्लिक अम्ल अनुपस्थित होते है।



(V) लाल रक्त कणिकाएँ (RBC) 

स्तनधारियों के रक्ताणु में केन्द्रक अनुपस्थित होता है। ऊँट व लामा के आरबीसी में केन्द्रक उपस्थित होते है।



(VII) लसिकाणु (Lymphocytes)

बी और टी लसिकाणु में प्रारुपी आनुवांशिक पदार्थ (Formative genetic material) अनुपस्थित होते हैं।

 

इनको के निम्न कारणों से अपवाद कहा जाता हैं –



*इनमें कोशिका झिल्ली, जीवद्रव्य, कोशिकांगो, एन्जाइम तथा अन्य कोशिकीय अवयव (Cell Componant) आदि का अभाव होता है।



*इनमें विभाजन की क्षमता नहीं पाई जाती है। इनकों विभाजन के लिए जीवित परपोषी कोशिका (Live host cell) की आवश्यकता है।


*सामान्यत: इनमें DNA अथवा RNA में से कोई एक ही उपस्थित होता है। जबकि प्रत्येक कोशिका में दोनों केन्द्रक अम्ल पाये जाते हैं।


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13 दिस॰ 2020

कार्डेटा संघ के प्रमुख वर्ग (Phylum Chordata Classes)2021

नमस्कार!
इससे पहले हमने नॉन कोर्डेटा के वर्गीकरण के बारे में पूरी तरह से जाना और आज हम कोर्डेटा के बारे में उसके वर्गीकरण का उल्लेख करेंगे।

संघ कोर्डेटा का वर्गीकरण:


इस में आने वाले जीवो में पृष्ठ रज्जु व पृष्ठ तंत्रिका रज्जू उपस्थित युगमित ग्रशनी कलोम छिद्र उपस्थित हृदय अदर बाग में उपस्थित होता है।
यह निम्न होते हैं:

पिशीज
एंफिबिया
रिफ्टिलिया
एवीज
मेंमेलिया

पिशीज:

A. कड्रिकथिज - अंत: कंकाल उपास्थिल बाह्य कंकाल प्लेकॉयड शलको का बना हुआ हैं।
 पृष्ठ रज्जु चिर स्थाई मुख सिर के अंदर तल पर 5 SE 7 जोड़ी गिल दरार इन पर oper kulam  अनुपस्थित होता है।
वायु कौशिक अनुपस्थित होता है इसीलिए यह लगातार करते रहते हैं या यूं कहें कि इन्हें लगातार तैरना पड़ता है।
इनमें अंड प्रजक या शिशु प्रजक असम तापी शरीर का तापमान नियंत्रण करने की क्षमता नहीं होती है ।
उदाहरण: कुत्ता मछली (स्कोलियो डोंन)

B. ओस्ट्रियोकथिज - अंत: कंकाल अस्थिल सतह पर सिक्लॉयड शलक मुख अग्र सिरे के अंत में 4 जोड़ी क्लॉम् छिद्र ऑपरकलोम से ढकी हुई वायु कोष उपस्थित हृदय दो कक्षीय एक आलिंद और एक निलय  पाया जाता है।
यह असम तापी होते हैं और एक लिंगी अंडज होते हैं।
उदाहरण: हिप्पोक्रेट्स (समुद्री घोड़ा), लबिया, कतला मछली।

एंफिबिया:

इस उप वर्ग में आने वाले जीव उभय चर शरीर सिर व गर्दन में विभाजित होता है।
कुछ जीवो में पूछ भी उपस्थित होती है इनकी त्वचा नम होती है तथा ग्रंथि श्लेष्मा ग्रंथि कुछ में विष ग्रंथि पाई जाती है।
 असम तापी होते हैं। इनमें heart-तीन कक्षक होते है दो आलिंद और एक निलय पाया जाता हैं।
इनमें कलॉम् फुसफुस  के द्वारा होता है।

रिफ्टिलिया:

इस वर्ग में आने वाले जीव रेंग कर चलने वाले होते हैं इन जीवन में पूछ सिर गर्दन पाई जाती है इनमें 2 जोड़ी पैर होते हैं की स्थली होते हैं इनकी त्वचा शलकिय शुष्क व ग्रंथि विहीन होती है इनमें अंत:कंकाल अस्थियों का बना होता है।
इनका हृदय अपूर्ण रूप से 4 कक्षी है।
लेकिन मगरमच्छ में पूरी तरह से विभा जीत है।
इनमें से बड़ों के द्वारा श:वसन होता है यह एक लिंगी होते हैं इनमें आंतरिक निषेचन काहे जाता है इन में प्रत्यक्ष परिवर्तन होता है 
उदाहरण: viper Naja, क्रोकोडाइल, किलोन, alligator।

एवीज:

इस वर्ग में सभी पक्षी आते हैं जो उड़ने की क्षमता रखते हैं।
(अपवाद शुतुरमुर्ग ,कीवी तथा पेंग्विन )शरीर परों से ढके हुए होता है।
इनकी त्वचा शुष्क होती है । ग्रंथि विहीन मुख के अग्रभाग में चोच सिर व पूछ छोटी , अग्र पाद पंखों में रूपांतरित हो जाते हैं
इनकी अस्थियां खोखली  होती है । वायु कोष युक्त  होती है।
पाचन तंत्र में ग्रसिका अन्नपुट तथा  आमाशय में पेषनी उपस्थित होती है। हिरदे इनका 4 कक्षी होता है। यह जीव समतापी होते हैं। इनमें फुसफुस के द्वारा श वशन होता है।
यह अंड प्रजक होते हैं।
उदाहरण: पे वो , कोलुंबा, कवर्ड।

मेंमेलिया: 

इस  वर्ग में आने वाले जीव सबसे विकसित वर्ग के माने जाते हैं। मेमो का अर्थ स्तन ग्रंथि होता है।
यह जीव क्षमता भी होते हैं उनकी त्वचा पर बाल पाए जाते हैं मादा में स्तन ग्रंथियां पाई जाती है जो शिशु को पोषण प्रदान करती है इनमें बाह्य कर्ण पल्लव उपस्थित होते हैं इनमें चार कोष्ठिय  हृदय पाई जाता है तथा परिसंचरण तंत्र दोहरा होता है।
मस्तिष्क विकसित होता है यह शिशु प्रजक होते हैं।
उदाहरण :  मक्काका, फेशिस,ratus Canis ।
(Post by Mr Sunil)


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10 दिस॰ 2020

जीव विज्ञान में जंतुओं का वर्गीकरण का वर्णन 2021

जंतुओं का वर्गीकरण:


जंतुओं को मोटे रूप में दो भागों में वर्गीकृत किया गया है:-
1 नॉन कोर्डेटा
2 कॉर्डेटा

1 नॉन कोर्डेटा वर्ग को निम्न भागों में बांटा गया है:
पॉरिफेरा
सीलेंट्रेटा
टिनोफोर
प्लेटी हेमिंथिज
एस्केहैलमिंथिज
ऐनेलिडा
आर्थोपोडा
मोलस्का
इकैनॉडर्मेटा
हेमिकॉर्डेटा

2 कॉडेटा वर्ग को निम्न भागों में बांटा गया है:
पिशीज
एंफिबिया
रिफ्टिलिया
एवीज
मेंमेलिया

आइए जानते हैं सभी वर्गों को detail  से।

पोरिफेरा:

पोरिफेरा उप वर्ग में शामिल किए थे जंतुओं का शारीरिक संगठन कोशिकीय स्तर का होता है।
यह जीव स्थान पर और एकल होते हैं यह समुद्र व अलवणीय जल में पाए जाते हैं ।
इनमें जल परिवहन तथा नाल तंत्र भी पाया जाता है इनका शरीर की सतह पर असंख्य क्षेत्र होते हैं जिन्हें ओस्टिया कहते हैं इन चीजों से ही होकर वायु तथा भोजन शरीर में प्रवेश करता है जल ओस्टिया द्वारा स्पंज गुफा में प्रवेश करता है तथा बड़े रंद्र जिसे ऑस्कुलम कहते हैं द्वारा बाहर निकलता है।
को एनोसाइट या कॉलर कोशिकाएं स्पंज गुफा तथा नाल तंत्र को स्तरीत करती है दी स्तरीय आर्य सममिति पाई जाती है स्तरों के मध्य कैल्शियम कार्बोनेट और स्पोंजइन तंतु का अंत:कंकाल पाया जाता है।
यदि इन जंतुओं में जनन की बात की जाए तो पूरी फेरा वर्ग के जंतुओं में अलैंगिक और लैंगिक दोनों प्रकार की जनन पाए जाते हैं अलैंगिक जनन विखंडन द्वारा होता है इनमें पुनरुदभवन की क्षमता पाई जाती है। लैंगिक जनन युगकों के द्वारा होता है
निषेचन आंतरिक तथा परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।
उदाहरण के लिए साइकस स्पोंजिला युस्पोंजिला आदि आते हैं

सीलेंट्रेटा:

सीलेंट्रेटा वर्ग में आने वाले जंतुओं को नाइडीरिया भी कहते हैं इनमें दंश कोशिका या नायडू ब्लास्ट कोशिका पाई जाती है जो स्परश्क तथा शरीर के अन्य भागों में पाई जाती है।
यह रक्षा करने पर शिकार को पकड़ने में सहायक होती है शारीरिक संगठन उत्तर स्तर का होता है तथा द्ववीकोरकी केंद्रीय जठर संवहनी गुहा उपस्थित होती है जो मुख्य द्वारा खुलती है।
कुछ सदस्य जैसे कोरल ने कैलशियम कार्बोनेट का कंकाल पाया जाता है इसमें दो प्रकार की संरचना पाई जाती है पॉलिप व मेडूसा।
पोलिप स्थावर तथा बेलनाकार होती है उदाहरण हाइड्रा!
मेडूसा छतरी के आकार का मुक्त प्लावी हैं उदाहरण जेलीफिश!
इनमें जनन अलैंगिक प्रकार का होता है जो मुकुलन द्वारा होता है इनमें पुनरुदभवन की क्षमता भी पाया जाती है
उदाहरण पायसेलिया तथा एड्मसिया

टिनोफोरा:

इस उपवर्ग के जंतुओं को समुद्री अखरोट भी कहते हैं।
यह समुद्री ध्वीकोरकी सममिति पाई जाती है तथा उत्तर श्रेणी का शारीरिक संगठन स्तर चयन हेतु पक्ष्माभी कंकत पटिका  पाई जाती है। यह उभय लिंगी होते हैं इनमें लैंगिक और अलैंगिक दोनों प्रकार का जन्म पाया जाता है इनमें बाह्यानिषेचन तथा अप्रत्यक्ष परिवर्तन होता है।
उदाहरण टिनोपलाना प्लुरोब्रंकिया

प्लेटी हेमिंथिज:

इस उप वर्ग में पाए जाने वाले जंतुओं के शरीर चपटे होते हैं इसीलिए इन जंतुओं को चपटे कृमि भी कहते हैं।
अंता परजीवी मनुष्य तथा जंतुओं की आंतों में देहगुहा सहित अन्य स्तरों का शारीरिक संगठन पाया जाता है।
इनमें अंकुश तथा चूशकांक पाए जाते हैं
उत्सर्जन हेतु ज्वाला कोशिकाएं पाई जाती उदय लेंगी निषेचन आंतरिक परिवर्तन में बहुत से लारवा अवस्थाए पाई जाती है।
उदाहरण प्लेन एरिया, फीता कर्मी 

स्केहैलमिंथिज:

इन्हें गोल कर्मी भी कहते है।
इन्हीं सूत्र कर्मी भी कहते हैं।
यह मुक्त जीवी, परजीवी जलीय तथा स्थली होते हैं।
यह जीव एक लिंगी आते हैं नर व मादा अलग-अलग पाए जाते हैं ईद में लैंगिक धविरूपत पाई जाती है।नर आकार में छोटा होता है तथा मादा घर में बड़ी होती है यह अखंड यह होते हैं इनमें अंग तंत्र प्रकार का आहार नाल पाया जाता है इनमें उत्सर्जन प्रोटोनेप्रीडिया के द्वारा होता है तथा तंत्रिका तंत्र में एक तंत्रिका वलाई जिसके अगले कथा अवश्य तंत्रिका निकली होती है जीवन चक्र इन में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रकार का पाया जाता है।
उदाहरण एस्केरिस, वाउचेरिया

ऐनेलिडा:

इस उपवर्ग में आने वाले जीव का शरीर वलयाकार खंडों से बना होता है इनका शारीरिक संगठन अंग तंत्र स्तर का होता है।
इनमें त्रीकोरकी  गुहिय वास्तविक खंडिभवन पाया जाता है।
इसमें बंद प्रकार का परिसंचरण तंत्र पाया जाता है तथा उत्सर्जन, वृक (नेफ्रीडिया) के द्वारा होता है।
अग्र सिरे के पास एक तंत्रिका वलय तथा इसी से जुड़ी तंत्रिका रज्जू उपस्थित होती है।
उदाहरण: एक लिंगी (nereis), उभयलिंगी (केचुआ और जोक)

आर्थोपोडा:

यहां आर्थो का मतलब संधि युक्त होता है तथा 
पोडा का मतलब पाद या पैर होता है।
इस उप वर्ग में आने वाले जीवो में संधि युक्त पेर पाए जाते हैं।
सिर छाती तथा उधर मैं विभाजित वही कंकाल क्यूटिकल का बना हुआ होता है।
इनमें रासायनिक राही स्पर्श ग्राही संवेदांग उपस्थित होते हैं ।
सामान्य तथा संयुक्त नेत्र पाए जाते हैं
वास्तविक देहगुहा उपस्थित पेशीय तंत्र विकसित होता है।
इनमें उत्सर्जन मेलपिगी की नलीकावों के द्वारा होता है।
इनमें खुला परिसंचरण तंत्र पाया जाता है इनका रक्त रंगहीन परंतु कुछ जीवो में हीमोसाइएनिन वर्णक के कारण रक्त का रंग नीला होता है इनमे स्वसन जलीय सदस्यों ने क्लोम या गिल्स के द्वारा होता है इनमें ट्रेकिया या बुक लंग्स के द्वारा स्थल में होता है। इनमें एक लिंगी व लैंगिक विविधता पाई जाती है।
उदाहरण: समस्त कीड़े जैसे मच्छर मछली मक्खी आदि।

मोलस्का:

इस वर्ग में पाए जाने वाले जीवो के शरीर कोमल होते हैं परंतु कठोर कैल्शियम कार्बोनेट के कवच से ढकी होते हैं शरीर अखंडित सिर पैर व  विसरल सरल मास में विभक्त संपूर्ण शरीर मेंटल आवरण से गिरा हुआ मेंटल व शरीर के बीच मेंटल गुहा उपस्थित होती है जलीय जंतुओं में श्वसन फेफड़ों द्वारा स्थली जंतु में फुसफुस द्वारा उत्सर्जन व्रक द्वारा होता है।
यह भोजन को चबाने के लिए रे डोला नाम का विशिष्ट अंग का उपयोग करते हैं इनके सिर पर संवेदी स्पर्श अंग पाए जाते हैं यह एक लिंगी अंड प्रजक होते हैं।
उदाहरण गोंगा ऑक्टोपस कटल सिपिया।

इकैनॉडर्मेटा:

इस ग्रुप वर्ग को समझाने के लिए इसका शाब्दिक अर्थ दिया जहां इकैनोस - कांटे और डर्मा- त्वचा होता है।
इस वर्ग में पाए जाने वाले जंतुओं की त्वचा कांटेदार पाई जाती है तथा समुद्री जीव होते हैं
इनमें जल संवहन तंत्र उपस्थित होता है जो भोजन ग्रहण करने चलने व श्वसन में सहायक होता है।
इनमें अंत: कंकाल कैल्शियम युक्त हड्डियों का बना होता है
इनमें उत्सर्जन तंत्र अनुपस्थित होता है तथा लैंगिक जनन और बाह्य निषेचन पाया जाता है इन में परिवर्तन अप्रत्यक्ष प्रकार का होता है और इनमें पुनरुदभवन की अपार क्षमता पाई जाती है
उदाहरण स्टार फिश समुद्री अर्चिन।

हेमी कॉर्डेटा:

इस उप वर्ग में समुद्री जीव पाए जाते हैं इनकी संरचना क्रमी रूपी होती है शरीर बेलना कार होता है
परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार का पाया जाता है आहर नाली यू आकार का होता है इनमें श्वसन गिल्स द्वारा शोषण होता है
उत्सर्जन सेंड ग्रंथि द्वारा होता है एक लिंगी होते हैं
उदाहरण बलेनोगलॉसस।
 
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4 दिस॰ 2020

C4 पथ|हैच चक्र|स्लेक चक्र क्या होता है?

C4 पथ|हैच चक्र|स्लेक चक्र :-

आज हम जानेंगे c4 पथ क्या होता है और यह कौन से पौधों में पाया जाता है उदाहरण द्वारा समझने की कोशिश करेंगे यह एग्जाम्स के अंदर बार-बार पूछा जाने वाला अच्छा टॉपिक है।

वह पौधे जो शुष्क क्षेत्रों में पाए जाते हैं उनमें c4 पथ पाया जाता है उन पौधों को c4 पादप कहते हैं
उदाहरण के लिए गन्ना मक्का ज्वार इत्यादि है!

C 4 पौधे सी C3 पौधों से अलग होते हैं C4 पौधे विशिष्ट प्रकार के होते हैं इनमें विशेष प्रकार की शारीरिक की पाई जाती है जिन्हें क्रेंज शारीरिकी कहते हैं।
यह पौधे उच्च ताप को सहन कर सकते हैं यह ऊंचे प्रकाश तीव्रता के प्रति अनुक्रिया करते हैं इनमें प्रकाश शवशन नहीं होता है ।
इनमें जेव भार उत्पादन अधिक होता है।


1.C4 पौधों के शव वाहन भंडार के चारों ओर स्थित कोशिका को पुलाचद्द cell  या बंडल शीट कहते हैं।
2. C4 पौधों की पत्तियों में bundle seat की अनेक परत पाई जाती है।
3.इनमें बहुत ज्यादा संख्या में क्लोरोप्लास्ट होते हैं इनकी भित्ति मोटी होती है जो गैसों के लिए अपार गम में होती है 
4. इनमें अंतर कोशिकीय स्थान नहीं होता है
5. वह पत्तियां जिनमें इस प्रकार की शारीरिक की होती है उन्हें क्रेंज शारीरिक ई वाली पत्तियांकहते हैं।
6. क्रेंज का अर्थ छल्ला या माला होता है।

हैच व स्लेक पथ में एक चक्रीय प्रक्रिया होती है C4 चक्र में CO2 का प्राथमिक ग्राही एक तीन कार्बन वाला अनु होता है जिसे पीईपी कहते हैं
  • पीईपी पर्ण मध्योतक कोशिका में पाया जाता है
  • CO2 का योगीकीकरण पीईपी कारबॉक्सिलेज एंजाइम द्वारा होता है यह एंजाइम्स पर्ण मध्योतक कोशिका में पाया जाता है
  • इस कोशिका में C4 अम्ल OAA बनाता है पर्ण मध्योतक कोशिका में RUBISCO ENZYME नहीं होता है
  • पर्ण मध्योतक कोशिका में बना OAA अन्य चार कार्बन वाले अम्ल में बदल जाता है जैसे मेलिक अम्ल व एस्पार्टिक अम्ल 
  • यह अम्ल जीव द्रव्य तंतु के माध्यम से पूला छिद कोशिका में चले जाते हैं
  • पुलाछद्द cell मैं चार कार्बन वाले अम्ल का विकारबॉक्सिलिकरण होता है जिससे CO2 तथा एक तीन कार्बन वाला अम्ल बनता है
  • यह तीन कार्बन वाला अम्ल पुनः पर्ण मध्योतक कोशिका में चले जाते है तथा pEp में बदल जाता है इस तरह से C4 चक्र पूरा होता है

पुलाछद्द cell मैं विकारबॉक्सिलिकरण से निकली CO2 केल्विन चक्र में प्रवेश करती है जिसके परिणाम स्वरुप शर्करा का निर्माण होता है
पुलाछद्द cell मैं रूबिस्को एंजाइम ज्यादा मात्रा में पाया जाता है परंतु pep case एंजाइम नहीं होता इसलिए केल्विन चक्र एक मौलिक पथ है जिसके परिणाम स्वरूप C3 C4 दोनों पादपों में शर्करा का निर्माण होता हैं।

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29 नव॰ 2020

सामान्य विज्ञान के प्रश्न उत्तर 2021(जनरल साइंस)|Gk.

सामान्य विज्ञान के प्रश्न उत्तर 2021

नमस्कार मित्रों आज के इस पोस्ट में हम जानेंगे कुछ सामान्य ज्ञान के प्रश्न उत्तर जो कंपटीशन एग्जाम्स में आते हैं
हम यहां कुल 40 प्रश्न उत्तर बताने वाले है
  • जैव विकास शब्द प्रस्तुत करने वाले वैज्ञानिक है?- हरबर्ट स्पेंसर
  • मनुष्य के हाथ पक्षियों के पंख चमगादड़ के पंख किसके उदाहरण है ?-समजात अंग के
  • जीवन संघर्ष पर आधारित डार्विन द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत कहलाता है ?-प्राकृतिक वरण का सिद्धांत
  • किस सजीव को पादप और जंतु के मध्य की योजक कड़ी माना जाता है ?-यूग्लीना
  • जैव विकास से संबंधित फिलोसोफी जूलॉजिकल पुस्तक लिखने वाले वैज्ञानिक का नाम?- लैमार्क
  • प्ले मार्ग द्वारा प्रस्तुत उपार्जित लक्षणों की वंशागति सिद्धांत का अपवाद प्रस्तुत करने वाले वैज्ञानिक है ?-विजमेन
  • मानव में कर्ण पीन्ना, अपेंडिक्स पुच्छ कशेरुक अंग कहलाते हैं?- अवशेषी अंग
  • हुगो डे व्रीज जे विकास के जिस सिद्धांत से संबंधित है उसका नाम बताइए?- उत्परिवर्तनवाद
  • समवर्ती अंगों के उदाहरण बताइए ?-कीड़ों पक्षियों एवं चमगादड़ के पंख
  • जंतु वर्ग ऐनेलिडा एवं आर्थोपोडा के मध्य की योजक कड़ी क्या है ?-peripatus
  • उत्परिवर्तन का सजीव पर प्रभाव होता है?- अनुवांशिक पदार्थ की संरचना में
  • ओजोन परत के क्षय से संबंधित सर्वप्रथम वैश्विक सम्मेलन कहां आयोजित किया गया था?- वियना में
  • भारत के किस राज्य ने सर्वप्रथम जलवायु परिवर्तन की कार्य योजना प्रस्तुत की ?-दिल्ली में
  • भारत में स्थित कौन सा विश्व विरासत स्थल दो राज्य में स्थित है?- कालका शिमला रेलवे लाइन हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में
  • भारत के किस राष्ट्रीय पर्व को सेरद्री  वनम के नाम से जाना जाता है?- साइलेंट वैली राष्ट्रीय पार्क केरल
  • भारत देश को कितने जैव भौगोलिक क्षेत्र में विभाजित किया गया है?- 10
  • भारत का सर्वप्रथम राष्ट्रीय समुद्री जैव विविधता के अंदर स्थापित किया गया है ?-जामनगर गुजरात
  • विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभ्यारण भारत के किस राज्य में है ?-बिहार में
  • कश्मीर के डचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में विशेष रूप से संरक्षित जीव प्रजाति है ?- हंग्गुल (कश्मीरी हिरण)
  • ब्लैक लंग के नाम से जाना जाने वाला वह रग जो कि कोयले की खानों में काम करने वाले श्रमिकों को होता है ?-न्यूमो कोनियोसिस
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण स्थित है चेन्नई में
  • बेकलाइट मेलामाइन किस प्रकार के प्लास्टिक है?- थर्मोसेटिंग प्लास्टिक
  • खाद्य सामग्रियों के पैकेट समय खाद्य परिरक्षण हेतु भरी जाने वाली गैस होती है ?-नाइट्रोजन
  • वेल्डिंग करने में प्रयुक्त गैसों का मिश्रण बताइए ?-ऑक्सीजन और एसिटिलीन
  • वह अम्ल जिसे ओयल ऑफ रिट्रीवाल कहां जाता है?- सल्फ्यूरिक अम्ल
  • सिंदूर के निर्माण में प्रयुक्त रसायन का नाम बताइए ?-मरक्यूरिक ऑक्साइड
  • किसी स्थान पर क्लोरीन की मात्रा के नियंत्रण के लिए एंटीक्लोर के रूप में प्रयुक्त रसायन का नाम ?-सोडियम थायो सल्फेट है
  • पावर अल्कोहल किन रसायनों का मिश्रण है ?-एथिल अल्कोहल बेंजीन और पेट्रोल का
  • प्लास्टर ऑफ पेरिस किस धातु का लवण है उसका नाम बताइए ?-कैल्शियम
  • कांच पर लिखने में प्रयुक्त अम्ल का नाम ?-हाइड्रो फ्लो ऑरिक अम्ल
  • लोहे का वयस्क जिसे प्राकृतिक चुंबक कहते हैं ?-मैग्नेटाइट
  • वह ताप बिंदु जिस पर कोई लौह चुंबकीय पदार्थ अनुज उनके पदार्थ में बदल जाती है ?-क्यूरी ताप
  • मुक्त रूप सेअपने गुरुत्व केंद्र पर आ लंबित छुम के सुई का क्षितिज के साथ बनने वाला कौन है ?-नमन कोण
  • वैबर किसका मात्रक है ?-चुंबकीय फ्लक्स का
  • किसी लोह चुंबकीय पदार्थ के भीतर परमाणुओं की संख्या अति सूक्ष्म संरचनाओं को क्या कहा जाता है?- डोमेन
  • किसी चुंबकीय क्षेत्र में स्थित चालक पर लगने वाले चुंबकीय बल की दिशा बताने वाला नियम ?-फ्लेमिंग का वाम हस्त नियम
  • विद्युत जनरेटर का कार्यकारी सिद्धांत है?- विद्युत चुंबकीय प्रेरण
  • स्थाई चुंबक किस पदार्थ से निर्मित किए जाते हैं ?-स्टील इस्पात
  • किसी चुंबक की सर्वाधिक आकर्षण शक्ति होती है?- उसके किनारों पर
  • चुंबकीय क्षेत्र का मात्रक होता है ?-गोस
  • विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक का नाम ?-ओरस्टेट

  • पृथ्वी एक विशाल चुंबक है इसका चुंबकीय क्षेत्र फैला होता है?- दक्षिण से उत्तर की ओर

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28 अक्टू॰ 2020

अर्धसूत्री विभाजन के चरण |अर्धसूत्री विभाजन क्या है?|Meiosis 2021.

अर्धसूत्री विभाजन के चरण |अर्धसूत्री विभाजन क्या है?|Meiosis 2021

हां तो भाई लोग कैसे हो आप सब ,आज हम आपको अर्धसूत्रीविभाजन के चरणों के बारे में बता रहे हैं।

यहां पर हम आपको बताने वाले हैं की:-
अर्धसूत्री विभाजन क्या होता है?
अर्धसूत्री विभाजन का इतिहास?
अर्धसूत्री विभाजन का विकास कैसे हुआ?
अर्धसूत्री विभाजन की पूरी प्रक्रिया?
अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएं?
अर्धसूत्री विभाजन first और second?

अर्धसूत्री विभाजन:

जीवशास्त्र में अर्धसूत्रीविभाजन (उच्चारित maɪˈoʊsɨs ) ऋणात्मक विभाजन की एक प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक कोशिका में मौजूद क्रोमोसोमों की संख्या आधी हो जाती है। पशुओं में अर्धसूत्रीविभाजन हमेशा युग्मकों के निर्माण में परिणीत होता है, जबकि अन्य जीवों में इससे बीजाणु उत्पन्न हो सकते हैं। सूत्रीविभाजन की तरह ही, अर्धसूत्रीविभाजन के शुरू होने के पहले मौलिक कोशिका का डीएनए कोशिका-चक्र के S-प्रावस्था में दोहरा हो जाता है। दो कोशिका विभाजनों द्वारा ये दोहरे क्रोमोसोम चार अगुणित युग्मकों या बीजाणुओं में बंट जाते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन लैंगिक प्रजनन के लिये आवश्यक होता है और इसलिये यह सभी यूकैर्योसाइटों में होता है। कुछ युकैर्योसाइटों में, विशेषकर बीडेलॉइड रोटिफरों में अर्धसूत्रीविभाजन की क्षमता नहीं होती और वे अनिषेकजनन द्वारा प्रजनन करते हैं। आरकिया या बैक्टीरिया में अर्धसूत्रीविभाजन नहीं होता और वे बाइनरी विखंडन जैसी लैंगिक प्रक्रियाओं द्वारा प्रजनन करते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन के समय द्विगुणित जनन कोशिका का जीनोम, जो क्रोमोसोमों में भरे हुए डीएनए के लंबे हिस्सों से बना होता है, का डीएनए दोहरापन और उसके बाद विभाजन के दो दौर होते हैं, जिससे चार अगुणित कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं। इनमें से प्रत्येक कोशिका में मौलिक कोशिका के क्रोमोसोमों का एक संपूर्ण सेट या उसकी जीन-सामग्री का आधा भाग होता है। यदि अर्धसूत्रीविभाजन से युग्मक उत्पन्न हुए, तो ये कोशिकाएं को गर्भाधान के समय संयोजित होकर अन्य किसी भी तरह के विकास के पहले नई द्विगुणित कोशिका या यग्मज का निर्माण करती हैं। इस प्रकार अर्धसूत्रीविभाजन की विभाजन की प्रक्रिया गर्भाधान के समय दो जीनोमों के संयोग के प्रति होने वाली अन्योन्य प्रक्रिया होती है। चूंकि हर मातापिता के क्रोमोसोमों का अर्धसूत्रीविभाजन के समय समधर्मी पुनःसंयोग होता है, इसलिये प्रत्येक युग्मक और हर युग्मज के डीएनए में एक अनूठी सांकेतिक रूपरेखा निहित होती है। अर्धसूत्रीविभाजन और गर्भाधान, दोनो मिलकर यूकैर्योसाइटों में लैंगिकता का प्रादुर्भाव करते हैं और जनसमुदायों में विशिष्ट जीनगुणों वाले व्यक्तियों की उत्पत्ति करते हैं।

सभी पौधों और कई प्रोटिस्टों में अर्धसूत्रीविभाजन के परिणामस्वरूप बीजाणु नामक अगुणित कोशिकाओं का निर्माण होता है जो बिना गर्भाधान के अलैंगिक तरीके से विभाजित हो सकती हैं। इन समूहों में युग्मक सूत्रीविभाजन द्वारा उत्पन्न होते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन में क्रोमोसोमों के पुनःवितरण के लिये सूत्रीविभाजन में प्रयुक्त जैवरसायनिक पद्धतियों में से ही कई पद्धतियों का प्रयोग होता है। अर्धसूत्रीविभाजन की अनेक अनूठी विशेषताएं होती हैं, जिनमें समधर्मी क्रोमोसोमों का जोड़ीकरण और पुनःसंयोग सबसे महत्वपूर्ण है।

मीयोसिस शब्द का मूल मीयो है, जिसका मतलब है-कम या अल्प.

इतिहास:

अर्धसूत्रीविभाजन की खोज 1876 में प्रख्यात जर्मन जीववैज्ञानिक आस्कर हर्टविग ने समुद्री साही के अंडों में की और पहली बार उसका विवरण दिया. बेल्जियन जीववैज्ञानिक एड्वर्ड वान बेनेडेन (1846–1910) ने फिर से इसका विवरण क्रोमोसोमों के स्तर पर 1883 में एस्केरिस के अंडों में दिया. प्रजनन और आनुवंशिकता में अर्धसूत्रीविभाजन के महत्व के बारे में सबसे पहले 1890 में जर्मन जीववैज्ञानिक आगस्त वीज़मैन (1834–1914) ने बताया, जिन्होंने कहा कि यदि क्रोमोसोमों की संख्या को बनाए रखना हो तो एक द्विगुणित कोशिका को चार अगुणित कोशिकाओं में परिवर्तित करने के लिये दो कोशिका विभाजनों की आवश्यकता होती है। 1911 में अमेरिकन जीनशास्त्री थामस हंट मोर्गन (1866–1945) ने ड्रोसोफिलिया मेलेनोगॉस्टर के अर्धसूत्रीविभाजन में क्रॉसओवर होते देखा और पहला जीनीय सबूत दिया कि क्रोमोसोमों पर जीनों का संचरण होता है।

विकास :

अर्धसूत्रीविभाजन का प्रादुर्भाव 1.4 बिलियन वर्षों पूर्व हुआ, ऐसा माना जाता है। यूकैर्योसाइटों के केवल एक्सकावेटा नामक सुपरग्रुप के सभी जीवों में अर्धसूत्रीविभाजन नहीं होता. अन्य पांचों मुख्य सुपरग्रुपों, आपिस्थोकाँट, अमीबाज़ोआ, राइज़ेरिया, आरकीप्लास्टिडा और क्रोमअल्वियोलेटों में सभी में अर्धसूत्रीविभाजन की जीनें सार्वभौमिक रूप से मौजूद रहती हैं, चाहे वे हमेशा सक्रिय न होती हों. कुछ एक्सकेवेटा जातियों में भी अर्धसूत्रीविभाजन होता है जिससे इस अनुमान को समर्थन मिलता है कि यह एक प्राचीन, पैराफाइलेटिक श्रेणी का समूह है। ऐसे यूकार्योटिक जीव, जिसमें अर्धसूत्रीविभाजन नहीं होता, का एक उदाहरण यूग्लीनाइड है।

यूकार्योटिक जीवन-चक्रों में अर्धसूत्रीविभाजन

युग्मज जीवन चक्र.

युग्मज जीवन चक्र.

बीजाणु जीवन चक्र.

जीवन चक्र:

यूकार्योटिक जीवन चक्रों के लैंगिक प्रजनन के समय अर्धसूत्रीविभाजन होता है, जिसमें अर्धसूत्रीविभाजन और गर्भाधान की लगातार चक्रीय प्रक्रिया होती रहती है। यह सामान्य सूत्रीकोशिका विभाजन के साथ-साथ जारी रहता है। बहुकोशीय जीवों में द्विगुणित से अगुणित में परिवर्तनकाल के बीच एक मध्यस्थ पायदान होती है जहां जीव का विकास होता है। जीव तब जनन कोशिकाओं की उत्पत्ति करता है जो जीवन-चक्र में जारी रहती हैं। शेष कोशिकाएं, जिन्हें दैहिक कोशिकाएं कहा जाता है, जीव के भीतर कार्य करती हैं और उसके साथ मरती है।

अर्धसूत्रीविभाजन और गर्भाधान के चक्र के कारण अगुणित और द्विगुणित दशाएं बारी-बारी से दोहराई जाती हैं। जीवन-चक्र की जैविक अवस्था द्विगुणित दशा (युग्मक या द्विगुणित जीवन-चक्र), अगुणित दशा (युग्मज या अगुणित जीवन-चक्र), या दोनो (बीजाणु या अगुणित-द्विगुणित जीवन-चक्र, जिसमें दो स्पष्ट जैविक अवस्थाएं होती हैं, एक अगुणित दशा में और दूसरी द्विगुणित दशा में) में हो सकती है। इस तरह, जैविक अवस्थाओं के स्थान के अनुसार, लैंगिक प्रजनन का प्रयोग करने वाले तीन प्रकार के जीवन-चक्र होते हैं।

युग्मक जीवन-चक्र में, जो मनुष्यों में भी होता है, जाति द्विगुणित होती है और युग्मज नामक द्विगुणित कोशिका से विकसित होती है। जीव की द्विगुणित जनन-रेखा स्टेम कोशिकाएं अर्धसूत्रीविभाजन द्वारा अगुणित युग्मकों का निर्माण करती हैं (नर में शुक्राणु और मादा में डिम्ब) जो संयुक्त होकर युग्मज का निर्माण करते हैं। द्विगुणित युग्मज का सूत्रीविभाजन द्वारा अनेक बार कोशिका-विभाजन होकर जीव का विकास होता है। सूत्रीविभाजन अर्धसूत्रीविभाजन से संबंधित प्रक्रिया है जो पैतृक कोशिका के जीनात्मक सदृश दो कोशिकाओं का निर्माण करती है। सामान्य सिद्धांत यह है कि सूत्रीविभाजन से दैहिक कोशिकाएं और अर्धसूत्रीविभाजन से जनन कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।

युग्मज जीवन-चक्र में जाति अगुणित होती है, जो युग्मक नामक एक एकल अगुणित कोशिका के प्रफलन और विभेदीकरण से उत्पन्न होती है। भिन्न लिंगों के दो जीव अपनी अगुणित जनन कोशिकाएं प्रदान करके एक द्विगुणित युग्मज का निर्माण करते हैं। इस युग्मज का तुरंत अर्धसूत्रीविभाजन हो जाता है, जिससे चार अगुणित कोशिकाओं की उत्पत्ति होती है। ये कोशिकाएं सूत्रीविभाजन द्वारा जीव का निर्माण करती हैं। कई कवक और प्रोटोजोआ युग्मज जीवन-चक्र के सदस्य हैं।

बीजाणु जीवन-चक्र में, जीव में अगुणित और द्विगुणित दशाएं बारी-बारी से होती हैं। इसलिये इस चक्र को पीढ़ियों का अदल-बदल भी कहा जाता है। द्विगुणित जीव की जनन-रेखा कोशिकाओं का अर्धसूत्रीविभाजन होकर बीजाणुओं की उत्पत्ति होती है। ये बीजाणु सूत्रीविभाजन द्वारा प्रफलित होकर एक अगुणित जीव में विकसित होते हैं। फिर अगुणित जीव की जनन कोशिकाएं अन्य अगुणित जीव की कोशिकाओं से संयुक्त होकर युग्मज का निर्माण करती हैं। इस युग्मज का बार-बार सूत्रीविभाजन और प्रफलन होकर पुनः द्विगुणित जीव का विकास होता है। बीजाणु जीवन-चक्र को युग्मक और युग्मज जीवन-चक्रों का संयोजन कहा जा सकता हैं।

प्रक्रिया:

चूंकि अर्धसूत्रीविभाजन एक ‘एक-तरफा’ प्रक्रिया है, इसलिये सुत्रीविभाजन की तरह कोशिका-चक्र में जुटा हुआ नहीं माना जा सकता है। लेकिन अर्धसूत्रीविभाजन के पहले उसकी तैयारी के सोपानों के प्रकार और नाम सूत्रीविभाजक कोशिका चक्र के इंटरफ़ेज़ के समान ही होते हैं।

इंटरफ़ेज़ की तीन अवस्थाएं होती हैं-

विकास 1 (G1) अवस्थाः यह एक अत्यंत सक्रिय अवस्था है, जिसमें कोशिका अपने विकास के लिये आवश्यक एंजाइमों और रचनात्मक प्रोटीनों सहित अपने सारे प्रोटीनों का संश्लेषण करती है। इस G1 अवस्था में प्रत्येक क्रोमोसोम में डीएनए का एक एकल (बहुत लंबा) अणु होता है। मनुष्यों में, इस दशा में दैहिक कोशिकाओं के समान ही कोशिकाओं में 46 क्रोमोसोम, 2N, होते हैं।
संश्लेषण (S) अवस्थाः जीनीय पदार्थ दोहरा हो जाता है: प्रत्येक क्रोमोसोम की प्रतिकृति बनती है, जिससे दो सहोदरा क्रोमेटिडों से 46 क्रोमोसोम उत्पन्न होते हैं। कोशिका को अभी भी द्विगुणित ही माना जाता है क्यौंकि इसमें सेंट्रोमीयरों की संख्या यथातथित ही रहती है। एक समान दिखने वाले सहोदरा क्रोमेटिड लाइट माइक्रोस्कोप से देखे जा सकने वाले घने ऱूप में भरे हुए क्रोमोसोमों में अभी संघनित नहीं हुए होते हैं। ऐसा अर्धसूत्रीविभाजन के प्रोफेज़ I अवस्था में होता है।
विकास 2 (G2) अवस्थाः G2 अवस्था अर्धसूत्रीविभाजन में नहीं होती है।
इंटरफेज़ के बाद अर्धसूत्रीविभाजन I और फिर अर्धसूत्रीविभाजन II होता है। अर्धसूत्रीविभाजन I में दो सहोदरा क्रोमेटिडों से बने समरूपी क्रोमोसोमों की जोड़ियां अलग होकर दो कोशिकाओं में बदल जाती हैं। प्रत्येक कन्या कोशिका में क्रोमोसोमों की एक संपूर्ण अगुणित मात्रा होती है; पहला अर्धसूत्रीविभाजन मौलिक कोशिका की गुणिता को 2 के गुणक से घटा देता है।

अर्धसूत्रीविभाजन II में प्रत्येक क्रोमोसोम के सहोदरा धागों (क्रोमेटिड) का पृथक्कीकरण होता है और व्यक्तिगत क्रोमेटिड अगुणित कन्या कोशिकाओं में बंट जाते हैं। अर्धसूत्रीविभाजन I से उत्पन्न दो कोशिकाएं अर्धसूत्रीविभाजन II के समय विभाजित होती हैं, जिससे 4 अगुणित कन्या कोशिकाओं का निर्माण होता है। अर्धसूत्रीविभाजन I और II दोनो, प्रोफेज़, मेटाफेज़, एनाफेज़ और टीलोफेज़ में बंटे होते हैं, जिनका उद्धेश्य सूत्रीविभाजन कोशिका चक्र के समरूपी उपअवस्थाओं के समान ही होता है। इसलिये, अर्धसूत्रीविभाजन में अर्धसूत्रीविभाजन I (प्रोफेज़ I, मेटाफेज़ I, एनाफेज़ I और टीलोफेज़ I) और अर्धसूत्रीविभाजन II (प्रोफेज़ II, मेटाफेज़ II, एनाफेज़ II और टीलोफेज़ II) की अवस्थाएं शामिल होती है।

अर्धसूत्रीविभाजन जीनीय विविधता को दो तरह से उत्पन्न करता है (1) स्वतन्त्र संरेखन और तत्पश्चात पहले अर्धसूत्रीविभाजन के समय समरूपी क्रोमोसोमों की जोड़ियों का पृथक्कीकरण, जिससे प्रत्येक क्रोमोसोम सेग्रीगेटों का प्रत्येक युग्मक में अनियत और स्वतन्त्र चुनाव होता है और (2) प्रोफेज़ I में समरूपी पुनःसंयोग द्वारा समरूपी क्रोमोसोमीय क्षेत्रों का भौतिक विनिमय होकर क्रोमोसोमों के भीतर डीएनए के नए संयोजन बनते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन की अवस्थाएं:

अर्धसूत्रीविभाजन I समरूपी क्रोमोसोमों का पृथक्कीकरण करके दो अगुणित कोशिकाओं (N क्रोमोसोम, मनुष्यों में 23) का निर्माण करता है, इसलिये इसे ऋणात्मक विभाजन कहा जाता है। नियमित द्विगुणित मानव कोशिका में 46 क्रोमोसोम होते हैं और उसे 2N माना जाता है क्योंकि उसमें समरूपी क्रोमोसोमों की 23 जोड़ियां होती हैं। लेकिन अर्धसूत्रीविभाजन I के बाद, हालांकि कोशिका में 46 क्रोमेटिड होता हैं, फिर भी उसे 23 क्रोमोसोमयुक्त N माना जाता है। ऐसा इसलिये होता है {Post by Mr Sunil}

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27 अक्टू॰ 2020

अर्धसूत्रण क्या है ? इसकी अवस्थाएँ और उपावस्थाएँ 2021.

अर्धसूत्रण क्या है ? इसकी अवस्थाएँ और उपावस्थाएँ :

हेलो भाई लोगों कैसे हो आप सब आज हम आपको अर्ध सूत्रण के बारे में जानकारी देंगे।

अर्ध सूत्रण क्या है?
अर्ध सूत्रण का परिचय?
अर्ध सूत्रण की संपूर्ण अवस्थाएं?

अर्धसूत्रण (Meiosis) एक विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है जो यूकैरिओट प्राणियों (eukaryotes) में लैंगिग जनन के लिये आवश्यक है। अर्धसूत्रण द्वारा युग्मक (gametes or spores) कोशिकाएँ पैदा होतीं हैं। सभी जन्तुओं तथा भूमि पर उगने वाले पौधों सहित अधिकांश जीवधारियों में युग्मकों को अण्ड कोशिका तथा शुक्राणु कोशिका कहते हैं।

यद्यपि अर्धसूत्री कोशिका विभाजन की प्रक्रिया और समसूत्री कोशिका विभाजन की प्रक्रिया में बहुत कुछ समानताएँ हैं, किन्तु अर्धसूत्री विभाजन, समसूत्री विभाजन से दो महत्वपूर्ण पक्षों में अलग है-

अर्धसूत्रण में गुणसूत्रों का पुनर्संयोजन (recombination) होता है और इस प्रक्रिया में जीनों (genes) का पुनर्वितरण (resuffle) हो जाता है। इससे प्रत्येक युग्मक (गैमीट) में नया जीन संचय (combination) का उत्पन्न होता है।
अर्धसूत्रण के परिनामस्वरूप चार अनुगुणित कोशिकाएँ बनती हैं जो जीन की दृष्टि से अनन्य (haploid) होती हैं।

परिचय

जिन प्राणियों में द्विलैंगिक प्रजनन की क्रिया प्रचलित है (और अधिकांश जंतुओं में यही क्रिया पाई जाती है), उनमें प्राणिजीवन एक संसेचित अंडे से आरंभ होता है। संसेचन की प्रक्रिया में अंडे के केंद्रक और शुक्राणु के केंद्रक का सायुज्य होता है और युग्मज (zygote) बनता है। 'सायुज्य' का अर्थ यह है कि आनुवांशिक पदार्थ युग्मज में द्विगुण हो गया, क्योंकि यह पदार्थ एक मात्रा में अंडे में था और एक मात्रा में शुक्राणु में। यह स्पष्ट है कि आनुवांशिक पदार्थ प्रत्येक पीढ़ी में द्विगुण नहीं होगा।

संसेचनविधि में आनुवंशिक पदार्थ में अनिवार्य द्विगुणन की क्रिया इस प्रकार होती है कि लैंगिक कोशिकाओं का परिपक्वताविभाजन (maturation division) के समय गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।

अवस्थाएँ

अर्धसूत्रण १
पूर्वावस्था (Prophase)
अर्धसूत्रण की पूर्वावस्था साधारण समसूत्रण की पूर्वावस्था की अपेक्षा अधिक समय तक स्थिर रहती है और कई उपावस्थाओं में विभाजित की जा सकती हैं। ये उपावस्थाएँ निम्नलिखित हैं : (1) लेप्टोटीन (Leptotene), (2) ज़ाइगोटीन (Zygotene),

(3) पैकिटीन (Pacytene), (4) डिप्लोटीन (Diplotene) तथा (5) डायाकिनीसिस (Diakinesis)।

लेप्टोटीन
लेप्टोटीन अवस्था में केंद्रक लंबे और पतले गुणसूत्रों से भरा पाया जाता है। इन सूत्रों पर कहीं कही कणिकाएँ पाई जाती हैं, जिनको क्रोमोमियर (Chromomere) कहते हैं। क्रोमोमियरों के बीच के गुणसूत्रों के भागों को इंटर क्रोमोमेरिके फ़ाइब्रिली (interchromomeric fibrillae) कहते हैं। इंट्रोक्रोमोमेरिक फाइब्रिली की अपेक्षा क्रोमोमियर में अभिरंजित होने की अधिक क्षमता होती है।

जाइगोटीन
ज़ाइगोटीन उपावस्था में गुणसूत्रों का युग्मन होता है। लैंगिक गुणसूत्रों के अतिरिक्त जीव के केंद्रक में गुणसूत्रों के दो एकात्मक कुलक होते हैं। एक कुलक में कई गुणसूत्र होते हैं, जो साधारणत: एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक प्रकार के दो गुणसूत्र होते हैं। जैसा ऊपर कहा जा चुका है, युग्मांशु उपवस्था में गुणसूत्रों का युग्मन होता है। युग्मन की क्रिया क्रमहीन रूप में नहीं होती, वरन्‌ बहुत क्रमबद्ध होती है। यह क्रिया केवल समान गुणसूत्रों के बीच होती है। प्रत्येक गुणसूत्र अपने समान सूत्र के साथ एक सिरे से दूसरे सिरे तक जुड़ जाता है और जुड़े हुए सूत्रों के क्रोमोमियर केवल अपने समान क्रोमोमियर से ही जुड़ते हैं। ज़ाइगोटीन अवस्था के अंत तक युग्मन की क्रिया पूर्ण हो जाती है। साथी गुणसूत्र एक दूसरे के इतने अधिक समीप होते हैं कि वे एक प्रतीत होते है। गुणसूत्रों के ऐसे जोड़ों को द्विसंयोजक कहा जाता है।

पैकिटीन
पैकिटीन उपावस्था में प्रत्येक द्विसंयोजक के युग्मित सूत्र एक दूसरे के इतने समीप होते हैं कि पूर्ण द्विसंयोजक देखने में एक सूत्र प्रतीत होता है। पैकिटीन समय में सर्पित संघनन (spiral condensation) के कारण द्विसंयोजक छोटे होने लगते हैं और डिप्लोटीन तथा डायाकिनीसिस समय में द्विसंयोजक और भी छोटे हो जाते हैं।

डिप्लोटीन
डिप्लोटीन उपावस्था में एक द्विसंयोजक के दोनों सूत्रों में से प्रत्येक सूत्र दो दो सूत्रों में विभाजित हो जाता है। इसका फल यह होता है कि प्रत्येक द्विसंयोजक दो जोड़ी युग्मित सूत्रों से बना पाया जाता है। एक गुणसूत्र के विभाजन से उत्पन्न दो सूत्रों को अर्धसूत्र (Chromatid) कहते हैं। डिप्लोटीन अवस्था में ये युग्मित सूत्र एक दूसरे से पृथक्‌ हो जाते हैं, किंतु कुछ स्थानों पर ये एक दूसरे से अलग नही हो पाते। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पक्ष का एक अर्धसूत्र जगह जगह पर टूट जाता है और फिर अभिमुख पक्ष के टूटे हुए एक अर्धसूत्र के दोनों खंडों से इसके खंड जुट जाते हैं। डिप्लोटीन अवस्था में युगल अर्धसूत्र (sister chromatid) एक दूसरे से सटे होते हैं और अभिमुख युगल अर्धसूत्रों से स्पष्टत: दूर होते हैं, परंतु जगह जगह पर उपर्युक्त घटना के कारण एक अर्धसूत्र अपने युगल अर्धसूत्र का साथ छोड़कर अभिमुख पक्ष के अर्धसूत्र के साथ सटा प्रतीत होता हैं। ऐसी संरचनाओं को किऐज़मेटा (Chiasmata) कहते हैं।

डायाकिनिसिस
सूत्रों के अधिक मोटे ओर छोटे होने के कारण डायाकिनिसिस में अर्धसूत्रों का पारस्परिक संबंध सुगमता से नहीं देखा जा सकता और मध्यावस्था (Metaphase) में तो गुणसूत्रों का भूयिष्ठ संघनन हो जाता हैं, जिससे किऐज्म़ेटा की उपस्थित का अनुमान किया जा सकता हैं।

मध्यावस्था
यद्यपि अर्धसूत्रण की पूर्वावस्था (Prophase) से पहले ही प्रत्येक गुणसूत्र का विभाजन हो जाता है, तथापि इनके सेंट्रोमियर का विभाजन मध्यावस्था तक भी नहीं होता। इस कारण विभाजित हो जाने के पर भी प्रत्येक गुणसूत्र की निजता बनी रहती है।

पश्चावस्था
पश्चावस्था मे प्रत्येक गुणसूत्र अपने साथी से अलग हो जाता है, अर्थात्‌ प्रत्येक द्विसंयोजक के दोनों गुणसूत्रों का विघटन (dissociation) हो जाता है और युग्मित गुणसूत्रों में से कि सी ध्रुव (Pole) की ओर जाता है और दूसरा उसके विरुद्ध ध्रुव की ओर। इस वर्णन से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र अपनी आधी संख्या में ही पहुँचते हैं।

अंतराल अवस्था
अंतराल अवस्था बहुत ही अल्पकालीन होती है और कुछ जंतुओं में तो होती ही नहीं।

अर्धसूत्रण २
अंतराल अवस्था का अंत होने पर फिर पूर्वावस्था का प्रारंभ होता है। मध्यावस्था, उसके पश्चात्‌ तथा अंत्यावस्था का क्रम वैसा ही होता है जैसा साधारण समसूत्रण में। यह ऊपर कहा जा चुका है कि अर्धसूत्रण में एक के बाद एक, दो बार, कोशिकाविभाजन होता है। इस प्रकार दोनों कोशिकाविभाजन की अवस्थाओं का पृथक्‌ पृथक्‌ निर्दिष्ट करने के लिये उनका मध्यावस्था-1, मध्यावस्था-2, अंत्यावस्था-1, अंत्यावस्था-2 इत्यादि कहते हैं।

यह ऊपर कहा जा चुका है कि पूर्वावस्था से ही प्रत्येक गुणसूत्र दो अर्धसूत्रों में विभाजित हो जाता है, परंतु उसका संट्रोमियर अविभाजित ही रहता है। इसलिये मध्यावस्था-2 पर गुणसूत्र सेंट्रोमियर को छोड़कर पूर्णरूप से विभाजित होता है। पश्चावस्था का प्रारंभ होने पर सेंट्रोमियर दो भागों में विभाजित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप गुणसूत्र के दोनों भाग एक दूसरे से मुक्त हो जाते हैं और अभिमुख ध्रुव की ओर जा सकते हैं।

लैंगिक गुणसूत्र विशेष गुणसूत्र होते हैं, जो एक लिंग में युग्मित होते हैं परंतु दूसरे में नही; जैसे ड्रोसॉफ़िला मेलानोगैस्टर (Drosophila melanogaster) में साधारण गुणसूत्रों के तीन जोड़े होते हैं, जिनको आलिंग सूत्र (Autosome) कहते हैं और दो लैंगिक गुणसूत्र होते हैं। मादा में दोनों लैंगिक गुणसूत्र एक समान होते हैं। इन्हें य-गुणसूत्र (X-chromosome) कहते हैं। नर में भी दो लिंग गुणसूत्र होते हैं। एक य-गुणसूत्र होता है, जो हर मादा य-गुणसूत्र के समान होता है, परंतु दूसरा य-गुणसूत्र से भिन्न होता है। इसे र-गुणसूत्र (Y-chromosome) कहते हैं।

मादा में अर्धसूत्रण के अंत में प्रत्येक कोशिका में चार गुणसूत्र होते हैं-तीन आलिंगसूत्र और एक य-गुणसूत्र। प्रत्येक ऊसाइट (Oocyte) दो बार विभाजित होता है। इससे चार कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं। इनमें से तीन ध्रुवीय पिंड (Polar Bodies) होती है, जिनका शीघ्र ही नाश हो जाता है और एक परिपक्व अंडाणु (Ovum) होता हैं
मादा की भाँति नर में प्रत्येक शुक्रकोशिका (Spermatocyte) दो बार विभाजित होती है, जिससे चार स्परमाटिड (Spermatid) उत्पन्न होते हैं।

ये स्परमाटिड दो भाँति के होते है। एक में तीन आलिंग सूत्र और एक य-गुणसूत्र होता है और दूसरे में तीन आलिंग सूत्र और एक र-गुणसूत्र होता है। यह स्पष्ट है कि स्परमाटिड दो प्रकार के होते हैं, परंतु अंडाणु एक ही प्रकार का। प्रत्येक स्परमाटिड क्रमश: लंबा और पतला हो जाता है। इसको स्परमातोज़ोऑन (Spermatozoon) कहते हैं। संसेचन में एक स्परमाटोज़ोऑन का सिर एक अंडाणु में प्रवेश करता है। संसेचित अंडाणु को युग्मज (Zygote) कहते हैं और चूँकि शुक्राणु दो प्रकार के होते है, अत: युग्मज भी दो प्रकार के होते हैं।

एक श्रेणी का युग्मज मादा होता है और दूसरी श्रेणी का नर।

ऐसा भी होता है कि मादा में दो य-गुणसूत्र हों और नर में केवल एक य-गुणसूत्र। ऐसी दशा में लिंगनिर्णय (sex determination) उसी भाँति होता है जैसे भाँति होता है जैसे ड्रोसॉफिला मेलानो-गैस्टर में। नर के शरीर में दो प्रकार के शुक्राणु उत्पन्न होते हैं-एक में आलिंग सूत्र के अतिरिक्त य-गुणसूत्र होता है और दूसरे में य-गुणसूत्र होता ही नहीं। ऐसे भी जंतु हैं जिनके नर में परस्पर भिन्न कई य-गुणसूत्र होते हैं। अर्धसूत्रण के अंत पर दो प्रकार के स्परमाटिड बनते है। एक प्रकार के स्परमाटिड में आलिंगसूत्र के अतिरिक्त य1, य2, य3 इत्यादि गुणसूत्र होते हैं और दूसरे में केवल र-गुणसूत्र और आलिंगसूत्र।
{Post by Mr Sunil}

इन्हें भी देखें!




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23 अक्टू॰ 2020

सजीवों में अलैंगिक जनन कैसे होता है? 2021|asexual reproduction:

सजीवों में अलैंगिक जनन कैसे होता है?2021|asexual reproduction:

हेलो भाई लोग कैसे हो आप सब आज हम आपको सजीव में अलैंगिक जनन के बारे में बताएंगे।

अलैंगिक जनन क्या है?
अलैंगिक जनन कैसे होता है?
अनिषेक जनन क्या है और इसके प्रकार?

अधिकांश जंतुओं में प्रजनन की क्रिया के लिए संसेचन (शुक्राणु का अंड से मिलना) अनिवार्य है; परंतु कुछ ऐसे भी जंतु हैं जिनमें बिना संसेचन के प्रजनन हो जाता है, इसको आनिषेक जनन या अलैंगिक जनन (Asexual reproduction) कहते हैं।

कुछ मछलियों को छोड़कर किसी भी पृष्ठवंशी में अनिषेक जनन नहीं पाया जाता और न कुछ बड़े बड़े कीटगण, जैसे व्याधपतंगगण (ओडोनेटा) तथा भिन्नपक्षानुगण (हेटरोष्टरा) में। कुछ ऐसे भी जंतु हैं जिनमें प्रजनन सर्वथा (अथवा लगभग सर्वथा) अनिषेक जनन द्वारा ही होता है, जैसे द्विजननिक विद्धपत्रा (डाइजेनेटिक ट्रेमैडोड्स), किरोटवर्ग (रोटिफर्स), जलपिंशु (वाटर फ़्ली) तथा द्रुयूका (ऐफ़िड) में। शल्किपक्षा (लेपिडोप्टरा) में अनिषेक जनन बिरले ही मिलता है, किंतु स्यूनशलभवंश (सिकिड्स) की कई एक जातियों में पाया जाता है। घुनों के कुछ अनुवंशों में भी अनिषेक जनन प्राय: पाया जाता है।

प्रजनन, लिंगनिश्चयन, तथा कोशिकाविज्ञान (साइटॉलोजी) की दृष्टि से कई प्रकार के अनिषेक जननतंत्र पहचाने जा सकते हैं।

प्रजनन की दृष्टि से अनिषेक जनन:
प्रजनन की दृष्टि से अनिषेक जनन का निम्नलिखित वर्गीकरण हो सकता है :

आकस्मिक अनिषेक जनन :
इसमें असंसिक्त अंडा कभी-कभी विकसित हो जाता है।

सामान्य अनिषेक जनन :
सामान्य अनिषेक जनन निम्नलिखित प्रकारों का होता है:

अनिवार्य अनिषेक जनन:
इसमें अंडा सर्वदा बिना संसेचन के विकसित होता है:

क. पूर्ण अनिषेक जनन में सब पीढ़ी के व्यक्तियों में अनिषेक जनन पाया जाता है।

ख. चक्रिक अनिषेक जनन में एक अथवा अधिक अनिषेक जनित पीढ़ियों के बाद एक द्विलिंग पीढ़ी आती रहती है।

वैकल्पिक अनिषेक जनन:
इसमें अंडा या तो संसिक्त होकर विकसित होता है या अनिषेक जनन द्वारा।

लिंगनिश्चय की दृष्टि से अनिषेक जनन संपादित करें
लिंगनिश्चय के विचार से अनिषेक जनन तीन प्रकार के होते है:

क. पुंजनन (ऐरिनॉटोकी) में असंसिक्त अंडे अनिषेक जनन द्वारा विकसित होकर नर जंतु बनते हैं। संसिक्त अंडे मादा जंतु बनते हैं।

ख. स्त्रीजनन (थेलिओटोकी) में असंसिक्त अंडे विकसित होकर मादा जंतु बनते हैं।

ग. उभयजनन (डेंटरोटोकी, ऐंफ़िटोकी) में असंसिक्त अंडे विकसित होकर कुछ नर और कुछ मादा बनते हैं।

कोशिकाविज्ञान की दृष्टि से अनिषेक जनन
कोशिकातत्व की दृष्टि से अनिषेक जनन कई प्रकार का होता है:

अर्धक अनिषेक जनन :
अर्धक अनिषेक जनन में अनिषेक जनन द्वारा उत्पन्न जंतु उन अंडों से विकसित होते हैं जिनमें केंद्रक सूत्रों (क्रोमोसोमों) का ह्रास होता है और केंद्रक सूत्रों की मात्रा आधी हो जाती है। यह दो विधि से होता है:

तनू अनिषेक जनन :
तनू अनिषेक जनन में अनिषेक जनन द्वारा उत्पन्न जंतुओं में केंद्रकसूत्रों की संख्या द्विगुण अथवा बहुगुण होती है। यह दो विधियों से होता है:

स्वतस्संसेचक (ऑटोमिक्टिक) :
स्वतस्संसेचक (ऑटोमिक्टिक) अनिषेक जनन में नियमित रूप से केंद्रक सूत्रों का युग्मानुबंध (सिनैप्सिस) तथा ह्रास होता है और केंद्रक सूत्रों की संख्या अंडों में आधी हो जाती है। परंतु केंद्रक सूत्रों की मात्रा, दो अर्धकेंद्रकों (न्यूक्लिआई) के सम्मेलन (फ़्यूज्हन) से पुन: स्थापित (रेस्टिट्यूटेड) केंद्रक के निर्माण अथवा अंतर्भाजन (एंडोमाइटोसिस) द्वारा पुन: बढ़ जाती है।

अमैथुनी (ऐपोमिक्टिक) :
अमैथुनी (ऐपोमिक्टिक) अनिषेक जनन में न तो केंद्रक सूत्रों की मात्रा में ह्रास होता है और न अर्धक अनिषेक जनन अंडों में केंद्रक सूत्रों का युग्मानुबंध और ह्रास होता है। ऐसे अंडों का यदि संसेचन होता है तो वे विकसित होकर मादा बन जाते हैं और यदि संसेचन नहीं होता तो वे नर बनते हैं। इस कारण एक ही मादा के अंडे विकसित होकर नर भी बन सकते हैं और मादा भी। अर्धक अनिषेक जनन का फल इस कारण सदा ही वैकल्पिक एवं पुंजनन (ऐरिनॉटोकस) होता है।
{Post by Mr Sunil}

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