जिका विषाणु:-
[1] फ्लाविविरिडए विषाणु परिवार से है। जो दिन के समय सक्रिय रहते हैं। इन्सानों में यह मामूली बीमारी के रूप में जाना जाता है, जिसे जिका बुखार, जिका या जिका बीमारी कहते हैं।
[2] के दशक से इस बीमारी का पता चला। यह अफ्रीका से एशिया तक फैला हुआ है। यह 2014 में प्रशांत महासागर से फ्रेंच पॉलीनेशिया तक और उसके बाद 2015 में यह मेक्सिको, मध्य अमेरिका तक भी पहुँच गया।
विषाणु वर्गीकरण
समुदाय (ग्रुप): Group IV ((+)ssRNA)
कुल (फैमिली): फ़्लैवीविरिडाए
वंश (जीनस): पीत विषाणु
जाति: ज़िका विषाणु
जिका बुखार
इतिहास
वर्ष 1947 में पीले बुखार का शोध कर रहे पूर्वी अफ्रीकी विषाणु अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों को जिका के जंगल में रीसस मकाक (एक प्रकार का लंगूर) को पिंजरे में रख कर अपना शोध कर रहे थे। उस बंदर को बुखार हो जाता है। 1952 में उसके संक्रामक घटक को जिका विषाणु नाम से बताया गया। यह इसके बाद नाइजीरिया में वर्ष 1954 में एक मानव से निकाला गया था।[4] इसके 2007 में खोज होने से पहले इससे संक्रमण के मामले अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में बहुत कम थे।[5]
अप्रैल 2007 में इसका प्रभाव पहली बार अफ्रीका और एशिया के बाहर देखने को मिला। यप नामक एक द्वीप में लाल चकत्ते, नेत्रश्लेष्मलाशोथ, और जोड़ों के दर्द के रूप में इसका असर दिखा, जिसे सामान्यतः डेंगू या चिकनगुनिया समझा जा रहा था।[6] लेकिन जब बीमार लोगों के रक्त का परीक्षण किया गया तो उनके रक्त में जिका विषाणु का आरएनए पाया गया। अब तक इसके 49 मामलों की पुष्टि हो चुकी है और जबकि 59 मामले की पुष्टि नहीं हुई और किसी के भी मरने की या अस्पताल में रखने की जानकारी नहीं है।[7]
लक्षण
अप्रैल 2007 में इसका प्रभाव पहली बार अफ्रीका और एशिया के बाहर देखने को मिला। यप नामक एक द्वीप में लाल चकत्ते, नेत्रश्लेष्मलाशोथ, और जोड़ों के दर्द के रूप में इसका असर दिखा, जिसे सामान्यतः डेंगू या चिकनगुनिया समझा जा रहा था।[6] लेकिन जब बीमार लोगों के रक्त का परीक्षण किया गया तो उनके रक्त में जिका विषाणु का आरएनए पाया गया। अब तक इसके 49 मामलों की पुष्टि हो चुकी है और जबकि 59 मामले की पुष्टि नहीं हुई और किसी के भी मरने की या अस्पताल में रखने की जानकारी नहीं है।[7]
लक्षण
जिका बुखार, जिसे जिका वायरस रोग, के नाम से भी जाना जाता है, एक रुग्णता है जो जिका वायरस के कारण उत्पन्न होती है।[8] लक्षण डेंगू बुखार की ही तरह होते हैं।[8] अधिकांश मामलों (60 - 80 %) में कोई लक्षण नहीं दिखते।[9] यदि कुछ लक्षण दिखते हैं तो वे लक्षण अमूमन इस प्रकार के हो सकते हैं - बुखार, लाल आँखें, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द लाल चकत्ते।[10][8] आम तौर पर लक्षण हल्के और 7 दिनों से भी कम रहते हैं।[11] वर्ष 2015 में इस आरंभिक संक्रमण से कोई मृत्यु नहीं हुई है।[9] संक्रमण को ग़ीयान-बारे संलक्षण Guillain–Barré सिंड्रोम से लिंक किया गया है।[9]
जिका बुखार मुख्यतया एडीज प्रकार के मच्छर के काटने से फैलता है।[11] शारीरिक संबंध बनाने और खून चढ़ाने से भी इसके फैलने की संभावना रहती है। [11] यह रोग गर्भवती माँ से गर्भस्थ शिशु में जा सकता है वर्टिकली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन और शिशु के सिर के अपूर्ण विकास की वजह बन सकता है।[8][9] इस रोग की पहचान के लिए होने वाली जाँचों में रक्त, मूत्र या लार संबंधी परीक्षण शामिल हैं, जो बीमार व्यक्ति में इस वायरस के आरएनए के होने का पता लगाने के लिए की जाती हैं।[11][8]
रोकथाम में मच्छरों से बचाव शामिल है ताकि जिन क्षेत्रों में इस रोग के होने की संभावना है वहाँ मच्छरों द्वारा काटे जाने से बचा जा सके। [11] इनमें मच्छर भगाने वाले उपाय अमल में लाना, कपड़ों से शरीर का अधिकतम भाग ढँककर रखना, मच्छरदानी का प्रयोग, मच्छर पुनर्जनन रोकने हेतु ठहरे पानी को हटाना जैसी बातें शामिल होती हैं। [8] इसका कोई कारगर टीका नहीं है।[11] ब्राजील के स्वास्थ्य अधिकारियों ने 2015 में प्रकोप के कारण दंपत्तियों को गर्भधारण से बचने की सलाह दी थी, और गर्भवती महिलाओं को उन इलाकों में यात्रा करने से बचने की सलाह दी जहां प्रकोप फैला हो।[12][11] यद्यपि इसका कोई विशिष्ट उपचार नहीं है, तथापि पैरासिटामॉल (एसिटामिनोफेन) इन लक्षणों में मददगार हो सकती है।[11] अस्पताल में भर्ती होने की शायद ही कभी जरूरत पड़ती है।[9]
टीके का विकास
जिका बुखार मुख्यतया एडीज प्रकार के मच्छर के काटने से फैलता है।[11] शारीरिक संबंध बनाने और खून चढ़ाने से भी इसके फैलने की संभावना रहती है। [11] यह रोग गर्भवती माँ से गर्भस्थ शिशु में जा सकता है वर्टिकली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन और शिशु के सिर के अपूर्ण विकास की वजह बन सकता है।[8][9] इस रोग की पहचान के लिए होने वाली जाँचों में रक्त, मूत्र या लार संबंधी परीक्षण शामिल हैं, जो बीमार व्यक्ति में इस वायरस के आरएनए के होने का पता लगाने के लिए की जाती हैं।[11][8]
रोकथाम में मच्छरों से बचाव शामिल है ताकि जिन क्षेत्रों में इस रोग के होने की संभावना है वहाँ मच्छरों द्वारा काटे जाने से बचा जा सके। [11] इनमें मच्छर भगाने वाले उपाय अमल में लाना, कपड़ों से शरीर का अधिकतम भाग ढँककर रखना, मच्छरदानी का प्रयोग, मच्छर पुनर्जनन रोकने हेतु ठहरे पानी को हटाना जैसी बातें शामिल होती हैं। [8] इसका कोई कारगर टीका नहीं है।[11] ब्राजील के स्वास्थ्य अधिकारियों ने 2015 में प्रकोप के कारण दंपत्तियों को गर्भधारण से बचने की सलाह दी थी, और गर्भवती महिलाओं को उन इलाकों में यात्रा करने से बचने की सलाह दी जहां प्रकोप फैला हो।[12][11] यद्यपि इसका कोई विशिष्ट उपचार नहीं है, तथापि पैरासिटामॉल (एसिटामिनोफेन) इन लक्षणों में मददगार हो सकती है।[11] अस्पताल में भर्ती होने की शायद ही कभी जरूरत पड़ती है।[9]
टीके का विकास
इस तरह के कई विषाणु हेतु प्रभावी टीके उपलब्ध है। डेंगू बुखार, जापानी इन्सेफेलाइटिस आदि बीमारी हेतु टीके का विकास 1930 के दशक में शुरू हुआ था। जबकि केवल डेंगू बुखार के लिए ही टीका 2010 के दशक के मध्य उपलब्ध हो पाया।
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