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23 अक्टू॰ 2020

सजीवों में लैंगिक जनन की पूरी प्रक्रिया 2021:|The entire process of sexual reproduction in living organisms|sexual reproduction.

सजीवों में लैंगिक जनन की पूरी प्रक्रिया 2021:|The entire process of sexual reproduction in living organisms:

sexual reproduction;

हेलो भाई लोग कैसे हो आप सभी, आज हम सजीवों में लैंगिक जनन की प्रक्रिया के बारे में जानेंगे।

पादपों में लैंगिक जनन?
जीवो में लैंगिक जनन?
निषेचन कैसे होता है?
अंडजनन कैसे होता है?

फूल, पौधों का जनन अंग:

जनन की वह क्रिया जिसमें दो युग्मकों के मिलने से बनी रचना युग्मज (जाइगोट) द्वारा नये जीव की उत्पत्ति होती है, लैंगिक जनन (sexual reproduction) कहलाती है।[1] यदि युग्मक समान आकृति वाले होते हैं तो उसे समयुग्मक कहते हैं। समयुग्मकों के संयोग को संयुग्मन कहते हैं। युग्मनज या तो सीधे पौधे को जन्म देता है या विरामी युग्मनज बन जाता है जिसे जाइगोस्पोर कहते हैं। इस प्रकार के लैंगिक जनन को 'समयुग्मी' कहते हैं।

लैंगिक जनन की प्रक्रिया के दो मुख्य चरण हैं - अर्धसूत्री विभाजन तथा निषेचन (fertilization)।

लैंगिक जनन की उत्पत्ति कैसे हुई, यह एक पहेली है। इस विषय में कई व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं हैं कि अलैंगिक जनन से लैंगिक जनन क्यों विकसित हुआ।

वनस्पतियों में लैंगिक जनन:

मुख्य लेख : पादप प्रजनन
अधिक विकसित पौधों में फल और बीज द्वारा लैंगिक जनन होता है। उनके फूलों में नर गैमीट और मादा युग्मक (गैमीट / Gamete) होते हैं, जिनके सायुज्य से युग्मज (Zygote) बनते हैं। ये बीज के अंदर भ्रूण में विकसित हो, अंकुर बनकर नए पौधों को जन्म देते हैं।

गैमीट बहुत सूक्ष्म और एककोशिकीय होते हैं। लैंगिक जनन में दो विभिन्न जनकों की आवश्यकता होती है। कभी-कभी एक ही प्रकार के दो गैमीट मिलकर जनन करते हैं। ऐसे मिलन का समागम (Conjugation) कहते हैं। दो विभिन्न गैमीटों के मिलने को निषेचन (Fertilization) कहते हैं। शैवाल और कवक सदृश निम्न श्रेणी के पौधों में समागम से जनन होता है और उच्च श्रेणी की वनस्पतियों में निषेचन से। जिन पौधों के गैमीट में नर और मादा का विभेद नहीं होता उन्हें समयुग्मक (Isogametes) कहते हैं और ऐसे पौधों को समयुग्मी (isogamous)। निषेचन में नर और मादा के मिलने से जो बनाता है उसे शुक्रितांड (Oospore), गैमीट को असम युग्मक (heterogamete) और पौधे को असमयुग्मीया या विविधपुष्पी (heterogamous) कहते हैं।

जनन की उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य विधियों, जैसे अजीवाणुजनन (Apospory), अपयुग्मजनन (Apogamy) और असेचन जनन (Parthenogenesis) से भी जनन होता है।

जन्तुओं में लैंगिक जनन :

प्राणियों में लैंगिक जनन की कई विधियाँ हैं, जिनमें प्रमुख विधियाँ हैं-

(1) सामान्य लैंगिक जनन,
(2) उभयलिंगी (Hermaphroditic) जनन,
(3) असेचन जनन (Parthenogenesis) और
(4) डिंभजनन (Paedogenesis)

सामान्य लैंगिक जनन:

सामान्य लैंगिक जनन में दो जन्यु कोशिकाएँ मिलकर एक युग्मज बनाती हैं। दो जन्तुओं की उत्पत्ति दो विभिन्न लिंगों के जनकों में होती है। नर जन्यु को शुक्राणु (Sperm) और स्त्री जन्यु को डिंब या अंडाणु (Ovum) कहते हैं। ये जन्यु विशेष अवयवों अर्थात्‌ जनदों (Gonads) में उत्पन्न होते हैं। नर जनद को वृषण (Testes) और स्त्री जनद को अंडाशय (Ovary) कहते हैं। पूर्वोक्त दोनों जन्युओं के मिलन को संसेचन (Fertilization) कहते हैं। संसेचन के फलस्वरूप युग्मज का निर्माण होता है। युग्मजों के खंडीकरण से भ्रूण बनता है और विकसित होकर शिशु रूप में जन्म लेता है।

वृषण शुक्रजनन नलिकाओं से बना होता है। प्रत्येक नलिका की अंत:भित्ति भ्रूणीय एपिथीलियम (Germinal epithelium) की बनी होती है, जिसके गुणन और विभेदीकरण (differentiation) से शुक्राणु बनते हैं। यह प्रक्रिया तीन क्रमों में होती है। पहला क्रम गुणन अवस्था (phase of multiplication), दूसरा क्रम वृद्धि अवस्था (phase of growth) और तीसरा क्रम परिपक्व अवस्था (phase of maturation) का है। भ्रूणीय एपिथीलियम की सभी कोशिकाएँ निर्माण में सक्षम होती हैं, पर कुछ ही उसमें भाग लेती हैं। ये कोशिकाएँ सूत्रविभाजन द्वारा ज्यामितीय अनुपात में विभाजित होती हैं। विभाजन से बनी कोशिकाओं को शुक्राणु-कोशिक-जन (Spermatogonia) कहते हैं। शुक्राणु-कोशिका-जन बड़े सूक्ष्म होते हैं। इनके अंदर पोषक पदार्थ एकत्रित हेने से ये बढ़ने लगते हैं। ऐसी वर्घित कोशिकाओं को प्राथमिक शुक्राणु कोशिका (Primary spermatocytes) कहते हैं। ये फिर परिपक्व अवस्था में प्रवेश करती हैं। यहाँ प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं का दो बार विभाजन होता है। प्रथम विभाजन अर्धसूत्रण (Meiosis) या ह्रास विभाजन (Reduction division) का है। इस विभाजन के पूर्व प्राथमिक शुक्राणु कोशिक के केंद्रक में उपस्थित क्रोमोसोम (Chromosome) की संख्या द्विगुणित (diploid) होती है, पर अर्धसूत्रण के समय पैतृक क्रोमोसोम अंतर्ग्रंथन (Synapsis) द्वारा जोड़ों में व्यवस्थित हे जो हैं। अंतर्ग्रंथन में कोई दो क्रोमोसोमी जोड़े नहीं बनाते वरन्‌ ऐसे ही क्रोमोसोम जोड़े बनाते हैं जो समधर्मी या समन शक्ति और रचना के होते हैं। इस प्रकार अर्धसूत्रण में पैतृक क्रोमोसोमों की संख्या अगुणित (haploid) हो जाती है। कोशिकाएँ अब द्वितीय शुक्राणुकोशिका हो जाती हैं। द्वितीय शुक्राणुकोशिका का एक बार फिर विभाजन होता है जिसे समसूत्रण (Mitosis) कहते हैं। इससे पूर्वशुक्राणु (Spermatids) बनते हैं, जो धीरे धीरे रूपांतरित होकर शुक्राणु बन जाते हैं।

लाक्षणिक शुक्राणु के तीन भाग - (1) सिर, (2) मध्य खंड या ग्रीवा और (3) पूँछ - होते हैं। विभिन्न शुक्राणुओं के सिर विभिन्न आकार के होते हैं। अधिकांश के अंडाकार, पर किस के छड़नुमा, किसी के कागपेंच से टेढ़े या अन्य प्रकार के भी होते हैं। इनके अग्रिम सिरे पर नुकीला अग्रस्थ भाग या एक्रोसोम (Acrosome) होता है। मध्य खंड प्राय: छोटा और बेलनाकार होता है। पूँछ का अक्षसूत्र (Axial filament) इसी में लिपटा रहता है। पूँछ तंतु के रूप में लंबी और क्रमश: पतली होती जाती है और कशाभ (Flagellum) की भाँति गतिशील होती है। यह शीघ्रतापूर्वक हिलती-डुलती रहती है, जिससे वीर्यद्रव, या जल में तैरकर अंडाणु में प्रवेश करने के लिये शुक्राणु आगे बढ़ता है।

अंडजनन (Oogenesis):

अंडाशय की कोशिकाओं से अंडे (Ova) उत्पन्न होते हैं। अंडे की भी (1) गुणन अवस्था, (2) वृद्धि अवस्था और (3) परिपक्व अवस्था होती है। अंडाशय की कुछ उत्पादक कोशिकाओं के गुणन विभाजन से डिंब कोशिकाजन (Oogonia) बनते हैं। कोशिकाजनों में अंडपीत एकत्र होकर बढ़ते हैं और बढ़कर प्राथमिक डिंबकोशिका (Ocoytes) बनते हैं। इनका फिर से ्ह्रास विभाजन होता है और ये दो अलग अलग कोशिकाओं में बँट जाते हैं। इनमें एक बहुत छोटी और दूसरी बड़ी होती है। छोटी को प्रथम ध्रुवीय पिंड (First polar body) ओर बड़ी को द्वितीय डिंबकोशिका कहते हैं। द्वितीय डिंबकोशिका का सूत्रण विभाजन होती है। यहाँ भी एक छोटी और दूसरी बड़ी होती है। बड़ी को परिपक्व या प्रौढ़ अंडा और छोटी को द्वितीय ध्रुवीय पिंड कहते हैं। प्राथमिक ध्रुवीय पिंडों का भी सूत्रण होकर ध्रुवकोशिका (Polocytes) प्राप्त होती हैं। ध्रुवीय रचनाएँ जनन के काम के लिए बेकार होती हैं।

अर्धभ्रूण या ह्रास विभाजन इस कारण आवश्यक है कि इस प्रकार उत्पन्न जन्युओं के संयोग से जो युग्मज बने उनमें पैतृक सूत्रों की संख्या उतनी ही रहे जितनी उस जाति के लिए आवश्यक है, अन्यथा संतान में पैतृक गुणों के बदल जाने की संभावना हो सकती है। पैतृक सूत्रों की संख्या निश्चित रखने के लिए युग्मज जगक के समय उनका ह्रास विभाजन आवश्यक है।

संसेचन (Fertilization):

डिंब के शुक्राणु से मिलने पर ही नए जीव की उत्पत्ति होती है। जिन प्राणियों में लैंगिक जनन होता है, उनमें डिंब और शुक्राणु दो विभिन्न लिंगवाले प्राणियों में उत्पन्न होते हैं। इनका सायुज्य नर और मादा के मिलकर संभोग करने से होता है। संभोग के समय डिंब और शुक्राणु निकट तो आ जाते हैं, पर शुक्र का डिंब के साथ मिलकर एक हो जाना, अर्थात्‌ डिंब का संसेचन कई बातों पर निर्भर करता है। परिस्थितियों के अनुकूल न होने पर अंडे का संसेचन नहीं होता। संसेचन के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं :

1. शुक्राणु का गतिशील होना - वृषण में शुक्राणु गतिशील नहीं होता, क्योंकि वृषण में थोड़े ही स्थान में असंख्य शुक्राणु रहते हैं। उनसे उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी अधिक होती है कि वे शिथिल रहते हैं, किंतु मैथुन के समय वृषण से निकलकर शुक्रप्रणाली में प्रवेश करने पर वे क्रियाशील एवं गतिशील हो जाते हैं। डिंब तक पहुँचने के लिय शुक्राणु को कुछ दूरी तय करनी पड़ती है और वह दूरी शुक्राणु वीर्य में (जहाँ अंत:संसेचन होता है), या जल में (जहाँ बाह्य संसेचन होता है), तैरकर तय करते हैं, अत: शुक्राणु का गतिशील होना आवश्यक है।

2. डिंब और शुक्राणु कापरिपक्व होना - संसेचन के लिए डिंब और शुक्राणु का परिपक्व होना भी आवश्यक है। किसी किसी प्राणी में डिंब अपरिपक्व अवस्था में स्खलित होता है और ध्रुवीय पिंड (polar bodies) अलग नहीं हुए रहते हैं। ऐसे डिंब के अंदर शुक्र का प्रवेश होने पर प्रथम और द्वितीय ध्रुवीय पिंड अलग हो जाने पर ही संसेचन की विधि पूर्ण होती है। जन्यु जब तक परिपक्व नहीं होते तब तक संसेचन संभव नहीं होता।

3. किसी द्रव माध्यम का होना - जिन प्राणियों में डिंब और शुक्राणु का संयोग जननी के शरीर के अंदर अथवा अंत: संसेचन द्वारा होता है, उन प्राणियों में नर की कुछ विशेष ग्रंथियों में से एक प्रकार के द्रव का स्त्राव होता है, जिसे वीर्य (semen) कहते हैं। इसी द्रव के साथ शुक्राणु मिले रहते हें। वीर्य के माध्यम से शुक्राणु तैरकर, गह्वर द्वार से होकर, डिंबवाही नली (Fallopian tubes) में प्रवेश कर डिंब से संयोग करते हैं। जिन प्राणियों में डिंब ओर शुक्राणुओं का संयोग प्राणी के शर के बाहर होता है, अर्थात्‌ जहाँ बाह्य संसेचन होता है, जैसे मछली और मेढक में, तो ऐसा संसेचन जल में होता है।

4. डिंब और शुक्राणु का एक ही जाति के प्राणी का होना - साधारणतया ऐसा देखा जाता है कि कुत्ते कुतियों से, सांड़ गाय से, मुर्गा मुर्गी से तथा बकरा बकरी से ही संयोग करता है। यदि विभिन्नजातियों के पशुओं का संयोग कराया भी जाए, तो उससे गर्भधारण नहीं होता, क्योंकि एक जाति का शुक्राणु दूसरी जाति के डिंब से संसेचन नहीं कर सकता। यदि किसी प्रकार ऐसा संसेचन कराया भी जाए और उससे संतान भी उत्पन्न हो तो संतान में जनन की क्षमता नहीं रहती। वह नपुंसक होती है।

अंत: संसेचन करनेवाले प्राणियों में अंडों की संख्या बहुत कम होती है और एक बार में एक या कुछ ही संतान उत्पन्न होती है, पर जिन प्राणियों में बाह्य संसेचन होता है, डिंब की संख्या अत्यधिक होती है और अंडों की अपेक्षा शुक्राणुओं की संख्या तो और भी अधिक। जब अंडों और शुक्राणुओं का संयोग जल में होता है, युग्मजों के लिए अनेक बाधाएँ रहती हैं, जैसे जल का ताप, उसकी अम्लता या क्षारीयता, (जल का पीएच मान आदि); जल की धारा की गति (मंद या तीव्र), आसपास के अन्य जलीय प्राणियों की उपस्थिति इत्यादि। अत: स्पीशीज की श्रृंखला बनाए रखने के लिए प्रकृति डिंब और शुक्राणुओं का उत्पादन अधिक संख्या में करती है, क्योंकि इन बहुसंख्यक अंडों ओर शुक्राणुओं में से अनेक अंडे और शुक्राणु उपर्युक्त कारणों में से कोई भी प्रतिकूल कारण हेने पर असंसेचित अवस्था में मर जाते हैं। संसेचन के लिए एक डिंब को एक ही शुक्राणु की आवश्यकता होती है। मनुष्य के एक बार के मैथुन में स्खलित वीर्य में सामान्यत: शुक्राणुओं की संख्या 22,60,00,000 अनुमानित की गई है। इनमें केवल एक ही शुक्राणु डिंब को संसेचित करने का काम करता है। प्रत्येक डिंबोत्सर्ग (Ovilation) में केवल एक ही डिंब डिंबग्रंथि से निकलता है।

ज्यों ही कोई क्रियाशील शुक्राणु अपने ही स्पीशीज के प्राणी के डिंब के संपर्क में आता है त्यों ही वह उसमें प्रवेश कर जाता है। शुक्राणु का सिर तो डिंब के अंदर घुस जाता है, किंतु उसकी पूँछ टूटकर बाहर ही रह जाती है। डिंब में शुक्र प्रवेश कर उसके अंदर अनेक घटनाओं को उत्तेजित करता है। सबसे पहले वह डिंब में किसी अन्य शुक्राणु के प्रवेश को रोकता है। यह काम इस प्रकार होता है 
{Post by Mr Sunil}

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