किशोरों के लिये यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है2023 ?
किशोरावस्था (10-19 वर्ष) वाल्यावस्था और वयस्कता के बीच की नाजुक अवस्था है । इस अवस्था में उत्तेजना, साहस, भावुकता और काम के प्रति उत्सुकता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। यदि इस अवस्था में होने वाले परिवर्तनों को सही तरीके से नहीं समझा जाये तो किशोर किशोरियाँ गलत रास्ते या भटकाव भरे जीवन में जा सकते है। अत: यौन शिक्षा के माध्यम से किशोरों को किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तनों, यौन एवं यौन संक्रमित रोगों की वैज्ञानिक जानकारी दी जाना आवश्यक है। जिससे उनका शरीर स्वस्थ्य रहे और वे अज्ञानता और भ्रमों से बच सकें।
प्रजनन स्वास्थ्य क्या हैं ?
आमतौर पर प्रजनन स्वास्थ्य का मतलब है, प्रजनन से संबंध रखने वाले सभी मामलों एवं अंगों का सही काम करना तथा उनके स्वस्थ्य रहने से है। साथ ही प्रजनन स्वास्थ्य में संतोषजनक और सुरक्षित लैंगिक जीवन, शिशु प्रसवन क्षमता और इस संबंध में स्वेच्छा से कब और कितने अंतराल पर ऐसा किया जाये, यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता शामिल है।
प्रजनन क्या हैं ?
सभी सजीव प्रजनन करते हैं। प्रजनन को उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके द्वारा कोई जीव अपनी जाति को बनाये रखता है। स्त्री और पुरूष प्रजनन प्रणाली का अंतर प्रजनन चक्र में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका के कार्य निष्पादन पर आधारित है।
मानव प्रजनन प्रक्रिया में दो तरह की लिंग कोशिकाएं संबद्ध है : पुरूष (शुक्राणु) और स्त्री (डिम्ब)। स्वस्था और लैंगिक दृष्टि से परिपक्व पुरूष लगातार शुक्राणु पैदा करते है। जब एक युवती स्त्री 12 या 13 वर्ष की तरूणावस्था को प्राप्त कर लेती है तो प्रत्येक 28 दिन के बाद उसे डिम्वाशय एकांतर रूप से एक डिम्ब विस्तृत करते करते है । यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक स्त्री का मासिक धर्म समाप्त नहीं हो जाता, सामान्यत: 50 वर्ष की उम्र तक।
स्त्री को अपने डिम्ब के गर्भधारण के लिए एक पुरूष की आवश्यकता होती है। शुक्राणु और डिम्ब, स्त्री की गर्भाशय नली में मिलते है और एक नये व्यक्ति की रचना आरंभ करते है। इसके बाद स्त्री उस संतान को गर्भावस्था से शिशुजन्म तक धारण करती है।
पुरूष और स्त्री के प्रजनन अंग और उनके कार्य ::
पुरूष के प्रजनन अंग:
शिश्न (लिंग)(Penis)
पेशाव नली (मूल नलिका) (Urethra)
अंडकोष (Testes)
अंडकोश की थैली (Scrotum)
वीर्य नलिका
वीर्यकोष(Seminal Vesicles)
शिश्न (लिंग) :-
यह पुरूषों का वह अंग है, जो संभोग क्रियसा में कार्य करता है । इसमें मूत्र विसर्जन और वीर्यस्खलन का द्वार होता है ये दो क्रियाएं अलग-अलग समय पर ही हो सकती है। हर व्यक्ति के शिश्न की लंबाई अलग-अलग होती है, किन्तु इससे इसके कार्य का कोई संबंध नहीं होता।
मूत्र नलिका :-
शिश्न के अंदर एक पतली नली होती है, जो मूत्र नलिका या पेशाब की नली कहलाती है। इसके दो कार्य होते है। पहला संभोग के समय वीर्य का स्खलन और दूसरा शरीर से पेशाव निकलना।
अंडकोष :-
यह उसे गोलागार पिण्ड है। इनमें शुक्राणु बनते है, इसमें एक ग्रंथि होती है, ये ग्रंथियां पुरूष के खास हारमोन्स (एक प्रकार के रासायनिक पदार्थ) भी बनाती है। यह पुरूषों में पुरूषत्व वाले गुण पैदा करती है। जैसे-ढाढ़ी, मूँछ के बाल उगना, आवाज का भारी होना, आदि इन्हीं हारमोन्स के कारण होता है। इसका विस्तार विवरण किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तन के पृष्ठ में है।
अंडकोष की थैली :-
यह एक थैली होती है, जिसमें दोनों अंडकोष रहते है। यह शिश्न के पीछे तथा दोनों तरफ स्थित होती है।
वीर्य नलिकाएँ :-
यह संख्या में दो होती है दोनों अंडकोशों से एक-एक नलिका निकलती है और जाकर पेशाब की नली से मिल जाती है। यह नलिकाएॅं अंडकोष में बनने वाले शुक्राणु को पेशाब की नली तक ले जाती है। यह शरीर के अंदर होती है इसलिये बाहर से दिखाई नहीं देती। पुरूष में पेशाब और वीर्य को बाहर लाने का एक ही रास्ता है जबकि स्त्रियों में ऐसा नहीं होता उनके प्रजनन अंगों की संरचना अलग होती है।
पोस्ट्रेट ग्रंथी :-
इन ग्रंथियों में शुक्राणुओं के लिये द्रव होता है। यह शुक्राणुओं को पौस्टिक द्रव देती है। जो शुक्राशय में होता है।
स्त्री के प्रजनन अंग: -
भगशिशन (Clitoris)
योनि (Vagina)
योनि माग Z (Cervix)
गर्भाशय (Uterus)
डिम्ब नलिका (Fallopian Tube)
डिम्ब कोष
भगशिश्न :-
यह स्त्रियों के गुप्त अंग का एक बाहरी भाग है, यह छोटा, गोल-सा मटर के दाने के बराबर मांसपिंड होता है, जो पेशाब की नली के सुराख (छिद्र) के ऊपर होता है। यह संभोग के समय अत्यंत संवेदनशील हो जाता है और उत्तेजना पैदा करने का कार्य करता हैं।
योनि :-
योनि योनिद्वार के छिद्र बीच में उपस्थित होता है। एक ओर पेशाव के रास्ते और गुदा के बीच में योनिद्वार होता है। योनि एक झिल्लीयुक्त रास्ता है यह एक और तो बाहर की तरफ खुलता है, और दूसरी ओर गर्भाशय की गर्दन तक पहुंचता है योनि बहुत ही लचीली होती है इसका कार्य है, शिशु का जन्म तथा संभोग क्रिया।
योनि के कार्य :-
संभोग के दौरान पुरूष उत्तेजित शिश्न और वीर्य को प्राप्त करती है।
अशिशु जन्म के दौरान स्त्री के शरीर से शिशु के बाहर निकलने का रास्ता है।
मासिक स्राव के दौरान स्त्री के गर्भाशय से रक्तस्त्राव को शरीर से बाहर निकलने का रास्ता देती है।
योनि मार्ग :-
यह एक रास्ता या नाल है जो यानिक से गर्भाशय तक जाता है, और गर्भाशय के निचले हिस्से की रचना करता है।
गर्भाशय :-
यह मांसपेशियों से बना नाशपाती के आकार का एक खोखला अंग है। इसकी दीवारें बहुत मजबूत होती है। इसके अदर झिल्ली की एक तह (परत) होती है। जिसे एन्ड्रोमीट्रियम (Endometrium) कहते है। मासिक धर्म के समय झिल्ली की यह परत नष्ट होकर रक्त के साथ गिर जाती है और हर माह गर्भाशय एक नई परत बनाता है। गर्भावस्था में शिशु गर्भाशय के अंदर बनता और बढ़ता एवं नौ माह उपरांत शिशु का जन्म होता है। गर्भाशय की लंबाई 7.5 सेमी और चौड़ाई 5 सेमी. होती है।
डिम्ब नलिका :-
इन्हें डिम्ब नाल या बीज नाल भी कहा जाता है। यह दो होती है, स्त्री की डिम्ब इन्हीं नालों (Fallopian Tube) से होकर गर्भाशय में आती है।
डिम्बकोष:-
यह दो अंडाकार ग्रंथियॉं है। इनसे एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन नाम के दो हारमोन्स निकलते है जो स्त्रियों का खास हारमोन्स है। डिम्बकोष बारी-बारी हर महिने एक डिम्ब (अण्डाणु) पैदा करता है। यह डिम्ब डिम्बनाल के चौंडे कीप जैसे मुॅंह द्वारा अंदर ले लिया जाता है। यहॉं से यह गर्भाशय की ओर चल पड़ता है। यह प्रक्रिया डिम्ब-उत्सर्ग कहलाती है। इस यात्रा में अगर डिम्ब पुरूष के शुक्राणु से मिलता है तो स्त्री का गर्भ ठहर जाता है। डिम्ब और शुक्राणु का मिलन संभाग द्वारा होता है।
Post by Mr Sunil
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