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14 जुल॰ 2023

मिशन चंद्रयान 3 की महत्वपूर्ण बातें 2023


मिशन चंद्रयान-3 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा भारतीय चंद्रमा मिशन का तीसरा मिशन है। यह मिशन चंद्रयान-2 के बाद आगे की उच्चतम सर्वोच्चता को प्राप्त करने का प्रयास है। यहां नीचे मिशन चंद्रयान-3 की कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:


मिशन का उद्देश्य: मिशन चंद्रयान-3 का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के पास वस्त्र मिश्रित पानी (वॉटर आइस) की खोज करना है। इसके अलावा यह मिशन चंद्रयान-2 द्वारा शुरू किए गए चंद्रमा के उपकरणों के आगे की खोज और तकनीकी प्रगति को भी बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।

अद्यतन किए गए प्रौद्योगिकी: मिशन चंद्रयान-3 में कई प्रौद्योगिकीयाँ मिश्रित की गई हैं। इसमें संकलन और प्रसंस्करण के लिए उपकरणों, स्वचालित अन्वेषण और प्राप्ति उपकरणों, नवीनतम नेविगेशन तकनीक, स्वचालित रूप से चंद्रमा की सतह को छूने वाले उपकरणों, और नई सूर्य चार्ज़ बैटरी तकनीक शामिल हैं।


चंद्रमा पर उपकरणों की ताकत: मिशन चंद्रयान-3 के तहत भारत चंद्रमा पर कई उपकरणों को भेजेगा जो विभिन्न परीक्षण और अनुसंधान कार्यों के लिए उपयोगी होंगे। इनमें शामिल हो सकते हैं उच्च-संकलन रेडार, ज़बरदस्ती रवाना करने वाला वाहन, सूर्य की किरणों को संग्रह करने का उपकरण, सतही विज्ञान और पाठशाला उपकरण, संगठित जनसंचार उपकरण, विज्ञान अध्ययन करने के लिए विज्ञान लैब आदि।

मिशन की योजना: मिशन चंद्रयान-3 में योजना यह है कि एक चंद्रमा रवाना करने वाली वाहन संचालित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न उपकरण स्थापित होंगे। चंद्रमा पर पहुंचने के बाद, उपकरणों को उनके कार्यों को पूरा करने के लिए सक्रिय किया जाएगा। इन उपकरणों का उपयोग चंद्रमा की सतह का मैपिंग, चंद्रमा के उपकरणों का अवलोकन, रोवर के माध्यम से नमूने के संग्रह और उपकरणों के बीच संचार जैसे कार्यों के लिए होगा।

मिशन चंद्रयान-3 भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है जो चंद्रमा के संबंधित अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में भारत को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।


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18 अप्रैल 2021

यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है2023?|Why sex education is necessary?

किशोरों के लिये यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है2023 ?

किशोरावस्था (10-19 वर्ष) वाल्यावस्था और वयस्कता के बीच की नाजुक अवस्था है । इस अवस्था में उत्तेजना, साहस, भावुकता और काम के प्रति उत्सुकता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। यदि इस अवस्था में होने वाले परिवर्तनों को सही तरीके से नहीं समझा जाये तो किशोर किशोरियाँ गलत रास्ते या भटकाव भरे जीवन में जा सकते है। अत: यौन शिक्षा के माध्यम से किशोरों को किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तनों, यौन एवं यौन संक्रमित रोगों की वैज्ञानिक जानकारी दी जाना आवश्यक है। जिससे उनका शरीर स्वस्थ्य रहे और वे अज्ञानता और भ्रमों से बच सकें।

प्रजनन स्वास्थ्य क्या हैं ?

आमतौर पर प्रजनन स्वास्थ्य का मतलब है, प्रजनन से संबंध रखने वाले सभी मामलों एवं अंगों का सही काम करना तथा उनके स्वस्थ्य रहने से है। साथ ही प्रजनन स्वास्थ्य में संतोषजनक और सुरक्षित लैंगिक जीवन, शिशु प्रसवन क्षमता और इस संबंध में स्वेच्छा से कब और कितने अंतराल पर ऐसा किया जाये, यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता शामिल है।

प्रजनन क्या हैं ?

सभी सजीव प्रजनन करते हैं। प्रजनन को उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके द्वारा कोई जीव अपनी जाति को बनाये रखता है। स्त्री और पुरूष प्रजनन प्रणाली का अंतर प्रजनन चक्र में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका के कार्य निष्पादन पर आधारित है।

मानव प्रजनन प्रक्रिया में दो तरह की लिंग कोशिकाएं संबद्ध है : पुरूष (शुक्राणु) और स्त्री (डिम्ब)। स्वस्था और लैंगिक दृष्टि से परिपक्व पुरूष लगातार शुक्राणु पैदा करते है। जब एक युवती स्त्री 12 या 13 वर्ष की तरूणावस्था को प्राप्त कर लेती है तो प्रत्येक 28 दिन के बाद उसे डिम्वाशय एकांतर रूप से एक डिम्ब विस्तृत करते करते है । यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक स्त्री का मासिक धर्म समाप्त नहीं हो जाता, सामान्यत: 50 वर्ष की उम्र तक।

स्त्री को अपने डिम्ब के गर्भधारण के लिए एक पुरूष की आवश्यकता होती है। शुक्राणु और डिम्ब, स्त्री की गर्भाशय नली में मिलते है और एक नये व्यक्ति की रचना आरंभ करते है। इसके बाद स्त्री उस संतान को गर्भावस्था से शिशुजन्म तक धारण करती है।

पुरूष और स्त्री के प्रजनन अंग और उनके कार्य ::पुरूष के प्रजनन अंग:

शिश्न (लिंग)(Penis)
पेशाव नली (मूल नलिका) (Urethra)
अंडकोष (Testes)
अंडकोश की थैली (Scrotum)
वीर्य नलिका
वीर्यकोष(Seminal Vesicles)

शिश्न (लिंग) :-
यह पुरूषों का वह अंग है, जो संभोग क्रियसा में कार्य करता है । इसमें मूत्र विसर्जन और वीर्यस्खलन का द्वार होता है ये दो क्रियाएं अलग-अलग समय पर ही हो सकती है। हर व्यक्ति के शिश्न की लंबाई अलग-अलग होती है, किन्तु इससे इसके कार्य का कोई संबंध नहीं होता।

मूत्र नलिका :-
शिश्न के अंदर एक पतली नली होती है, जो मूत्र नलिका या पेशाब की नली कहलाती है। इसके दो कार्य होते है। पहला संभोग के समय वीर्य का स्खलन और दूसरा शरीर से पेशाव निकलना।

अंडकोष :-
यह उसे गोलागार पिण्ड है। इनमें शुक्राणु बनते है, इसमें एक ग्रंथि होती है, ये ग्रंथियां पुरूष के खास हारमोन्स (एक प्रकार के रासायनिक पदार्थ) भी बनाती है। यह पुरूषों में पुरूषत्व वाले गुण पैदा करती है। जैसे-ढाढ़ी, मूँछ के बाल उगना, आवाज का भारी होना, आदि इन्हीं हारमोन्स के कारण होता है। इसका विस्तार विवरण किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तन के पृष्ठ में है।

अंडकोष की थैली :-
यह एक थैली होती है, जिसमें दोनों अंडकोष रहते है। यह शिश्न के पीछे तथा दोनों तरफ स्थित होती है।

वीर्य नलिकाएँ :-
यह संख्या में दो होती है दोनों अंडकोशों से एक-एक नलिका निकलती है और जाकर पेशाब की नली से मिल जाती है। यह नलिकाएॅं अंडकोष में बनने वाले शुक्राणु को पेशाब की नली तक ले जाती है। यह शरीर के अंदर होती है इसलिये बाहर से दिखाई नहीं देती। पुरूष में पेशाब और वीर्य को बाहर लाने का एक ही रास्ता है जबकि स्त्रियों में ऐसा नहीं होता उनके प्रजनन अंगों की संरचना अलग होती है।

पोस्ट्रेट ग्रंथी :-
इन ग्रंथियों में शुक्राणुओं के लिये द्रव होता है। यह शुक्राणुओं को पौस्टिक द्रव देती है। जो शुक्राशय में होता है।

स्त्री के प्रजनन अंग: -

भगशिशन (Clitoris)
योनि (Vagina)
योनि माग Z (Cervix)
गर्भाशय (Uterus)
डिम्ब नलिका (Fallopian Tube)
डिम्ब कोष

भगशिश्न :-
यह स्त्रियों के गुप्त अंग का एक बाहरी भाग है, यह छोटा, गोल-सा मटर के दाने के बराबर मांसपिंड होता है, जो पेशाब की नली के सुराख (छिद्र) के ऊपर होता है। यह संभोग के समय अत्यंत संवेदनशील हो जाता है और उत्तेजना पैदा करने का कार्य करता हैं।

योनि :-
योनि योनिद्वार के छिद्र बीच में उपस्थित होता है। एक ओर पेशाव के रास्ते और गुदा के बीच में योनिद्वार होता है। योनि एक झिल्लीयुक्त रास्ता है यह एक और तो बाहर की तरफ खुलता है, और दूसरी ओर गर्भाशय की गर्दन तक पहुंचता है योनि बहुत ही लचीली होती है इसका कार्य है, शिशु का जन्म तथा संभोग क्रिया।

योनि के कार्य :-
संभोग के दौरान पुरूष उत्तेजित शिश्न और वीर्य को प्राप्त करती है।
अशिशु जन्म के दौरान स्त्री के शरीर से शिशु के बाहर निकलने का रास्ता है।
मासिक स्राव के दौरान स्त्री के गर्भाशय से रक्तस्त्राव को शरीर से बाहर निकलने का रास्ता देती है।

योनि मार्ग :-
यह एक रास्ता या नाल है जो यानिक से गर्भाशय तक जाता है, और गर्भाशय के निचले हिस्से की रचना करता है।

गर्भाशय :-
यह मांसपेशियों से बना नाशपाती के आकार का एक खोखला अंग है। इसकी दीवारें बहुत मजबूत होती है। इसके अदर झिल्ली की एक तह (परत) होती है। जिसे एन्ड्रोमीट्रियम (Endometrium) कहते है। मासिक धर्म के समय झिल्ली की यह परत नष्ट होकर रक्त के साथ गिर जाती है और हर माह गर्भाशय एक नई परत बनाता है। गर्भावस्था में शिशु गर्भाशय के अंदर बनता और बढ़ता एवं नौ माह उपरांत शिशु का जन्म होता है। गर्भाशय की लंबाई 7.5 सेमी और चौड़ाई 5 सेमी. होती है।

डिम्ब नलिका :-
इन्हें डिम्ब नाल या बीज नाल भी कहा जाता है। यह दो होती है, स्त्री की डिम्ब इन्हीं नालों (Fallopian Tube) से होकर गर्भाशय में आती है।

डिम्बकोष:-
यह दो अंडाकार ग्रंथियॉं है। इनसे एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन नाम के दो हारमोन्स निकलते है जो स्त्रियों का खास हारमोन्स है। डिम्बकोष बारी-बारी हर महिने एक डिम्ब (अण्डाणु) पैदा करता है। यह डिम्ब डिम्बनाल के चौंडे कीप जैसे मुॅंह द्वारा अंदर ले लिया जाता है। यहॉं से यह गर्भाशय की ओर चल पड़ता है। यह प्रक्रिया डिम्ब-उत्सर्ग कहलाती है। इस यात्रा में अगर डिम्ब पुरूष के शुक्राणु से मिलता है तो स्त्री का गर्भ ठहर जाता है। डिम्ब और शुक्राणु का मिलन संभाग द्वारा होता है।
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16 मार्च 2021

10 मनोवैज्ञानिक तथ्य जिसे कोई नहीं जानता।2021

10 मनोवैज्ञानिक तथ्य जिसे कोई नहीं जानता।2021

आइए जानें!

1.20 सेकंड के लिए किसी भी व्यक्ति को गले लगाने से हमारे शरीर में ऑक्सीटोसिन का स्त्राव होता है, जिसके कारण आप किसी पर अधिक विश्वास कर सकते हैं।

2. डार्क चॉकलेट में एक ऐसा रसायन होता है जो हमारे शरीर में फेनिलथाइलमाइन में बदल जाता है, जो मूड को शांत करता है और आपके तनाव के स्तर को कम करता है।

3. नकारात्मक चीजों को लिखना और उन्हें कचरे के डिब्बे में फेंकना, एक मनोवैज्ञानिक चाल है जो आपके मनोदशा को सुधार सकती है।

4. प्यार पाना सबकी टाइमिंग है। मनोविज्ञान कहता है कि सही व्यक्ति को खोजना संभव है, लेकिन गलत समय पर।

5. तेज बुद्धि और उच्च बुद्धि स्तर वाले लोग रात को देर से सोने की संभावना रखते हैं।

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मानव शरीर से जुड़े 5 बड़े रहस्य?

6. दिल टूटना या प्यार में धोखा खाने वाले व्यक्ति की मरने की संभावना अधिक होती है। इसे स्ट्रेस कार्डियोमायोपैथी कहा जाता है।

7. नजरअंदाज करने एक गहरी चोट लगने के बराबर कष्ट देता है

8. लगभग 68% लोग प्रेत कंपन सिंड्रोम से पीड़ित हैं। इसमें हम अपने फोन को वाइब्रेट करते हुए महसूस करते हैं जबकि फोन वास्तव में वाइब्रेट नहीं कर रहा है।

9. कई अध्ययनों से पता चला है कि औसत महिलाएं 47 घंटे और 15 मिनट से अधिक समय तक कोई गुप्त बात नहीं रख सकती हैं।

10. अगर आप अपने पसंदीदा गाने को अपना अलार्म बनाते हैं तो आप उसे नापसंद करने लगते हैं।


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मानव में रक्त समूह (blood group) के प्रकार समझाइए??

Scientific names of animals? /जंतुओं के वैज्ञानिक नाम??

जीवाणु या बैक्टीरिया क्या है इनकी संरचना द्वारा समझाइए??

विषाणु या वायरस क्या है चित्र द्वारा समझाइए??

डीएनए क्या है हमारे शरीर में किस प्रकार अहम भूमिका निभाता है??

उल्का पिंड क्या है यह कहां से आते हैं और यह किस प्रकार बनते हैं??

Zika virus क्या है यह कौन कौन से रोग उत्पन्न कर सकते हैं समझाइए??

12वीं में साइंस सब्जेक्ट वाले स्टूडेंट आगे फील्ड में कौन-कौन से क्षेत्र में उन्हें काम करना चाहिए??

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28 अक्टू॰ 2020

अर्धसूत्री विभाजन के चरण |अर्धसूत्री विभाजन क्या है?|Meiosis 2021.

अर्धसूत्री विभाजन के चरण |अर्धसूत्री विभाजन क्या है?|Meiosis 2021

हां तो भाई लोग कैसे हो आप सब ,आज हम आपको अर्धसूत्रीविभाजन के चरणों के बारे में बता रहे हैं।

यहां पर हम आपको बताने वाले हैं की:-
अर्धसूत्री विभाजन क्या होता है?
अर्धसूत्री विभाजन का इतिहास?
अर्धसूत्री विभाजन का विकास कैसे हुआ?
अर्धसूत्री विभाजन की पूरी प्रक्रिया?
अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएं?
अर्धसूत्री विभाजन first और second?

अर्धसूत्री विभाजन:

जीवशास्त्र में अर्धसूत्रीविभाजन (उच्चारित maɪˈoʊsɨs ) ऋणात्मक विभाजन की एक प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक कोशिका में मौजूद क्रोमोसोमों की संख्या आधी हो जाती है। पशुओं में अर्धसूत्रीविभाजन हमेशा युग्मकों के निर्माण में परिणीत होता है, जबकि अन्य जीवों में इससे बीजाणु उत्पन्न हो सकते हैं। सूत्रीविभाजन की तरह ही, अर्धसूत्रीविभाजन के शुरू होने के पहले मौलिक कोशिका का डीएनए कोशिका-चक्र के S-प्रावस्था में दोहरा हो जाता है। दो कोशिका विभाजनों द्वारा ये दोहरे क्रोमोसोम चार अगुणित युग्मकों या बीजाणुओं में बंट जाते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन लैंगिक प्रजनन के लिये आवश्यक होता है और इसलिये यह सभी यूकैर्योसाइटों में होता है। कुछ युकैर्योसाइटों में, विशेषकर बीडेलॉइड रोटिफरों में अर्धसूत्रीविभाजन की क्षमता नहीं होती और वे अनिषेकजनन द्वारा प्रजनन करते हैं। आरकिया या बैक्टीरिया में अर्धसूत्रीविभाजन नहीं होता और वे बाइनरी विखंडन जैसी लैंगिक प्रक्रियाओं द्वारा प्रजनन करते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन के समय द्विगुणित जनन कोशिका का जीनोम, जो क्रोमोसोमों में भरे हुए डीएनए के लंबे हिस्सों से बना होता है, का डीएनए दोहरापन और उसके बाद विभाजन के दो दौर होते हैं, जिससे चार अगुणित कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं। इनमें से प्रत्येक कोशिका में मौलिक कोशिका के क्रोमोसोमों का एक संपूर्ण सेट या उसकी जीन-सामग्री का आधा भाग होता है। यदि अर्धसूत्रीविभाजन से युग्मक उत्पन्न हुए, तो ये कोशिकाएं को गर्भाधान के समय संयोजित होकर अन्य किसी भी तरह के विकास के पहले नई द्विगुणित कोशिका या यग्मज का निर्माण करती हैं। इस प्रकार अर्धसूत्रीविभाजन की विभाजन की प्रक्रिया गर्भाधान के समय दो जीनोमों के संयोग के प्रति होने वाली अन्योन्य प्रक्रिया होती है। चूंकि हर मातापिता के क्रोमोसोमों का अर्धसूत्रीविभाजन के समय समधर्मी पुनःसंयोग होता है, इसलिये प्रत्येक युग्मक और हर युग्मज के डीएनए में एक अनूठी सांकेतिक रूपरेखा निहित होती है। अर्धसूत्रीविभाजन और गर्भाधान, दोनो मिलकर यूकैर्योसाइटों में लैंगिकता का प्रादुर्भाव करते हैं और जनसमुदायों में विशिष्ट जीनगुणों वाले व्यक्तियों की उत्पत्ति करते हैं।

सभी पौधों और कई प्रोटिस्टों में अर्धसूत्रीविभाजन के परिणामस्वरूप बीजाणु नामक अगुणित कोशिकाओं का निर्माण होता है जो बिना गर्भाधान के अलैंगिक तरीके से विभाजित हो सकती हैं। इन समूहों में युग्मक सूत्रीविभाजन द्वारा उत्पन्न होते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन में क्रोमोसोमों के पुनःवितरण के लिये सूत्रीविभाजन में प्रयुक्त जैवरसायनिक पद्धतियों में से ही कई पद्धतियों का प्रयोग होता है। अर्धसूत्रीविभाजन की अनेक अनूठी विशेषताएं होती हैं, जिनमें समधर्मी क्रोमोसोमों का जोड़ीकरण और पुनःसंयोग सबसे महत्वपूर्ण है।

मीयोसिस शब्द का मूल मीयो है, जिसका मतलब है-कम या अल्प.

इतिहास:

अर्धसूत्रीविभाजन की खोज 1876 में प्रख्यात जर्मन जीववैज्ञानिक आस्कर हर्टविग ने समुद्री साही के अंडों में की और पहली बार उसका विवरण दिया. बेल्जियन जीववैज्ञानिक एड्वर्ड वान बेनेडेन (1846–1910) ने फिर से इसका विवरण क्रोमोसोमों के स्तर पर 1883 में एस्केरिस के अंडों में दिया. प्रजनन और आनुवंशिकता में अर्धसूत्रीविभाजन के महत्व के बारे में सबसे पहले 1890 में जर्मन जीववैज्ञानिक आगस्त वीज़मैन (1834–1914) ने बताया, जिन्होंने कहा कि यदि क्रोमोसोमों की संख्या को बनाए रखना हो तो एक द्विगुणित कोशिका को चार अगुणित कोशिकाओं में परिवर्तित करने के लिये दो कोशिका विभाजनों की आवश्यकता होती है। 1911 में अमेरिकन जीनशास्त्री थामस हंट मोर्गन (1866–1945) ने ड्रोसोफिलिया मेलेनोगॉस्टर के अर्धसूत्रीविभाजन में क्रॉसओवर होते देखा और पहला जीनीय सबूत दिया कि क्रोमोसोमों पर जीनों का संचरण होता है।

विकास :

अर्धसूत्रीविभाजन का प्रादुर्भाव 1.4 बिलियन वर्षों पूर्व हुआ, ऐसा माना जाता है। यूकैर्योसाइटों के केवल एक्सकावेटा नामक सुपरग्रुप के सभी जीवों में अर्धसूत्रीविभाजन नहीं होता. अन्य पांचों मुख्य सुपरग्रुपों, आपिस्थोकाँट, अमीबाज़ोआ, राइज़ेरिया, आरकीप्लास्टिडा और क्रोमअल्वियोलेटों में सभी में अर्धसूत्रीविभाजन की जीनें सार्वभौमिक रूप से मौजूद रहती हैं, चाहे वे हमेशा सक्रिय न होती हों. कुछ एक्सकेवेटा जातियों में भी अर्धसूत्रीविभाजन होता है जिससे इस अनुमान को समर्थन मिलता है कि यह एक प्राचीन, पैराफाइलेटिक श्रेणी का समूह है। ऐसे यूकार्योटिक जीव, जिसमें अर्धसूत्रीविभाजन नहीं होता, का एक उदाहरण यूग्लीनाइड है।

यूकार्योटिक जीवन-चक्रों में अर्धसूत्रीविभाजन

युग्मज जीवन चक्र.

युग्मज जीवन चक्र.

बीजाणु जीवन चक्र.

जीवन चक्र:

यूकार्योटिक जीवन चक्रों के लैंगिक प्रजनन के समय अर्धसूत्रीविभाजन होता है, जिसमें अर्धसूत्रीविभाजन और गर्भाधान की लगातार चक्रीय प्रक्रिया होती रहती है। यह सामान्य सूत्रीकोशिका विभाजन के साथ-साथ जारी रहता है। बहुकोशीय जीवों में द्विगुणित से अगुणित में परिवर्तनकाल के बीच एक मध्यस्थ पायदान होती है जहां जीव का विकास होता है। जीव तब जनन कोशिकाओं की उत्पत्ति करता है जो जीवन-चक्र में जारी रहती हैं। शेष कोशिकाएं, जिन्हें दैहिक कोशिकाएं कहा जाता है, जीव के भीतर कार्य करती हैं और उसके साथ मरती है।

अर्धसूत्रीविभाजन और गर्भाधान के चक्र के कारण अगुणित और द्विगुणित दशाएं बारी-बारी से दोहराई जाती हैं। जीवन-चक्र की जैविक अवस्था द्विगुणित दशा (युग्मक या द्विगुणित जीवन-चक्र), अगुणित दशा (युग्मज या अगुणित जीवन-चक्र), या दोनो (बीजाणु या अगुणित-द्विगुणित जीवन-चक्र, जिसमें दो स्पष्ट जैविक अवस्थाएं होती हैं, एक अगुणित दशा में और दूसरी द्विगुणित दशा में) में हो सकती है। इस तरह, जैविक अवस्थाओं के स्थान के अनुसार, लैंगिक प्रजनन का प्रयोग करने वाले तीन प्रकार के जीवन-चक्र होते हैं।

युग्मक जीवन-चक्र में, जो मनुष्यों में भी होता है, जाति द्विगुणित होती है और युग्मज नामक द्विगुणित कोशिका से विकसित होती है। जीव की द्विगुणित जनन-रेखा स्टेम कोशिकाएं अर्धसूत्रीविभाजन द्वारा अगुणित युग्मकों का निर्माण करती हैं (नर में शुक्राणु और मादा में डिम्ब) जो संयुक्त होकर युग्मज का निर्माण करते हैं। द्विगुणित युग्मज का सूत्रीविभाजन द्वारा अनेक बार कोशिका-विभाजन होकर जीव का विकास होता है। सूत्रीविभाजन अर्धसूत्रीविभाजन से संबंधित प्रक्रिया है जो पैतृक कोशिका के जीनात्मक सदृश दो कोशिकाओं का निर्माण करती है। सामान्य सिद्धांत यह है कि सूत्रीविभाजन से दैहिक कोशिकाएं और अर्धसूत्रीविभाजन से जनन कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।

युग्मज जीवन-चक्र में जाति अगुणित होती है, जो युग्मक नामक एक एकल अगुणित कोशिका के प्रफलन और विभेदीकरण से उत्पन्न होती है। भिन्न लिंगों के दो जीव अपनी अगुणित जनन कोशिकाएं प्रदान करके एक द्विगुणित युग्मज का निर्माण करते हैं। इस युग्मज का तुरंत अर्धसूत्रीविभाजन हो जाता है, जिससे चार अगुणित कोशिकाओं की उत्पत्ति होती है। ये कोशिकाएं सूत्रीविभाजन द्वारा जीव का निर्माण करती हैं। कई कवक और प्रोटोजोआ युग्मज जीवन-चक्र के सदस्य हैं।

बीजाणु जीवन-चक्र में, जीव में अगुणित और द्विगुणित दशाएं बारी-बारी से होती हैं। इसलिये इस चक्र को पीढ़ियों का अदल-बदल भी कहा जाता है। द्विगुणित जीव की जनन-रेखा कोशिकाओं का अर्धसूत्रीविभाजन होकर बीजाणुओं की उत्पत्ति होती है। ये बीजाणु सूत्रीविभाजन द्वारा प्रफलित होकर एक अगुणित जीव में विकसित होते हैं। फिर अगुणित जीव की जनन कोशिकाएं अन्य अगुणित जीव की कोशिकाओं से संयुक्त होकर युग्मज का निर्माण करती हैं। इस युग्मज का बार-बार सूत्रीविभाजन और प्रफलन होकर पुनः द्विगुणित जीव का विकास होता है। बीजाणु जीवन-चक्र को युग्मक और युग्मज जीवन-चक्रों का संयोजन कहा जा सकता हैं।

प्रक्रिया:

चूंकि अर्धसूत्रीविभाजन एक ‘एक-तरफा’ प्रक्रिया है, इसलिये सुत्रीविभाजन की तरह कोशिका-चक्र में जुटा हुआ नहीं माना जा सकता है। लेकिन अर्धसूत्रीविभाजन के पहले उसकी तैयारी के सोपानों के प्रकार और नाम सूत्रीविभाजक कोशिका चक्र के इंटरफ़ेज़ के समान ही होते हैं।

इंटरफ़ेज़ की तीन अवस्थाएं होती हैं-

विकास 1 (G1) अवस्थाः यह एक अत्यंत सक्रिय अवस्था है, जिसमें कोशिका अपने विकास के लिये आवश्यक एंजाइमों और रचनात्मक प्रोटीनों सहित अपने सारे प्रोटीनों का संश्लेषण करती है। इस G1 अवस्था में प्रत्येक क्रोमोसोम में डीएनए का एक एकल (बहुत लंबा) अणु होता है। मनुष्यों में, इस दशा में दैहिक कोशिकाओं के समान ही कोशिकाओं में 46 क्रोमोसोम, 2N, होते हैं।
संश्लेषण (S) अवस्थाः जीनीय पदार्थ दोहरा हो जाता है: प्रत्येक क्रोमोसोम की प्रतिकृति बनती है, जिससे दो सहोदरा क्रोमेटिडों से 46 क्रोमोसोम उत्पन्न होते हैं। कोशिका को अभी भी द्विगुणित ही माना जाता है क्यौंकि इसमें सेंट्रोमीयरों की संख्या यथातथित ही रहती है। एक समान दिखने वाले सहोदरा क्रोमेटिड लाइट माइक्रोस्कोप से देखे जा सकने वाले घने ऱूप में भरे हुए क्रोमोसोमों में अभी संघनित नहीं हुए होते हैं। ऐसा अर्धसूत्रीविभाजन के प्रोफेज़ I अवस्था में होता है।
विकास 2 (G2) अवस्थाः G2 अवस्था अर्धसूत्रीविभाजन में नहीं होती है।
इंटरफेज़ के बाद अर्धसूत्रीविभाजन I और फिर अर्धसूत्रीविभाजन II होता है। अर्धसूत्रीविभाजन I में दो सहोदरा क्रोमेटिडों से बने समरूपी क्रोमोसोमों की जोड़ियां अलग होकर दो कोशिकाओं में बदल जाती हैं। प्रत्येक कन्या कोशिका में क्रोमोसोमों की एक संपूर्ण अगुणित मात्रा होती है; पहला अर्धसूत्रीविभाजन मौलिक कोशिका की गुणिता को 2 के गुणक से घटा देता है।

अर्धसूत्रीविभाजन II में प्रत्येक क्रोमोसोम के सहोदरा धागों (क्रोमेटिड) का पृथक्कीकरण होता है और व्यक्तिगत क्रोमेटिड अगुणित कन्या कोशिकाओं में बंट जाते हैं। अर्धसूत्रीविभाजन I से उत्पन्न दो कोशिकाएं अर्धसूत्रीविभाजन II के समय विभाजित होती हैं, जिससे 4 अगुणित कन्या कोशिकाओं का निर्माण होता है। अर्धसूत्रीविभाजन I और II दोनो, प्रोफेज़, मेटाफेज़, एनाफेज़ और टीलोफेज़ में बंटे होते हैं, जिनका उद्धेश्य सूत्रीविभाजन कोशिका चक्र के समरूपी उपअवस्थाओं के समान ही होता है। इसलिये, अर्धसूत्रीविभाजन में अर्धसूत्रीविभाजन I (प्रोफेज़ I, मेटाफेज़ I, एनाफेज़ I और टीलोफेज़ I) और अर्धसूत्रीविभाजन II (प्रोफेज़ II, मेटाफेज़ II, एनाफेज़ II और टीलोफेज़ II) की अवस्थाएं शामिल होती है।

अर्धसूत्रीविभाजन जीनीय विविधता को दो तरह से उत्पन्न करता है (1) स्वतन्त्र संरेखन और तत्पश्चात पहले अर्धसूत्रीविभाजन के समय समरूपी क्रोमोसोमों की जोड़ियों का पृथक्कीकरण, जिससे प्रत्येक क्रोमोसोम सेग्रीगेटों का प्रत्येक युग्मक में अनियत और स्वतन्त्र चुनाव होता है और (2) प्रोफेज़ I में समरूपी पुनःसंयोग द्वारा समरूपी क्रोमोसोमीय क्षेत्रों का भौतिक विनिमय होकर क्रोमोसोमों के भीतर डीएनए के नए संयोजन बनते हैं।

अर्धसूत्रीविभाजन की अवस्थाएं:

अर्धसूत्रीविभाजन I समरूपी क्रोमोसोमों का पृथक्कीकरण करके दो अगुणित कोशिकाओं (N क्रोमोसोम, मनुष्यों में 23) का निर्माण करता है, इसलिये इसे ऋणात्मक विभाजन कहा जाता है। नियमित द्विगुणित मानव कोशिका में 46 क्रोमोसोम होते हैं और उसे 2N माना जाता है क्योंकि उसमें समरूपी क्रोमोसोमों की 23 जोड़ियां होती हैं। लेकिन अर्धसूत्रीविभाजन I के बाद, हालांकि कोशिका में 46 क्रोमेटिड होता हैं, फिर भी उसे 23 क्रोमोसोमयुक्त N माना जाता है। ऐसा इसलिये होता है {Post by Mr Sunil}

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23 अक्टू॰ 2020

सजीवों में अलैंगिक जनन कैसे होता है? 2021|asexual reproduction:

सजीवों में अलैंगिक जनन कैसे होता है?2021|asexual reproduction:

हेलो भाई लोग कैसे हो आप सब आज हम आपको सजीव में अलैंगिक जनन के बारे में बताएंगे।

अलैंगिक जनन क्या है?
अलैंगिक जनन कैसे होता है?
अनिषेक जनन क्या है और इसके प्रकार?

अधिकांश जंतुओं में प्रजनन की क्रिया के लिए संसेचन (शुक्राणु का अंड से मिलना) अनिवार्य है; परंतु कुछ ऐसे भी जंतु हैं जिनमें बिना संसेचन के प्रजनन हो जाता है, इसको आनिषेक जनन या अलैंगिक जनन (Asexual reproduction) कहते हैं।

कुछ मछलियों को छोड़कर किसी भी पृष्ठवंशी में अनिषेक जनन नहीं पाया जाता और न कुछ बड़े बड़े कीटगण, जैसे व्याधपतंगगण (ओडोनेटा) तथा भिन्नपक्षानुगण (हेटरोष्टरा) में। कुछ ऐसे भी जंतु हैं जिनमें प्रजनन सर्वथा (अथवा लगभग सर्वथा) अनिषेक जनन द्वारा ही होता है, जैसे द्विजननिक विद्धपत्रा (डाइजेनेटिक ट्रेमैडोड्स), किरोटवर्ग (रोटिफर्स), जलपिंशु (वाटर फ़्ली) तथा द्रुयूका (ऐफ़िड) में। शल्किपक्षा (लेपिडोप्टरा) में अनिषेक जनन बिरले ही मिलता है, किंतु स्यूनशलभवंश (सिकिड्स) की कई एक जातियों में पाया जाता है। घुनों के कुछ अनुवंशों में भी अनिषेक जनन प्राय: पाया जाता है।

प्रजनन, लिंगनिश्चयन, तथा कोशिकाविज्ञान (साइटॉलोजी) की दृष्टि से कई प्रकार के अनिषेक जननतंत्र पहचाने जा सकते हैं।

प्रजनन की दृष्टि से अनिषेक जनन:
प्रजनन की दृष्टि से अनिषेक जनन का निम्नलिखित वर्गीकरण हो सकता है :

आकस्मिक अनिषेक जनन :
इसमें असंसिक्त अंडा कभी-कभी विकसित हो जाता है।

सामान्य अनिषेक जनन :
सामान्य अनिषेक जनन निम्नलिखित प्रकारों का होता है:

अनिवार्य अनिषेक जनन:
इसमें अंडा सर्वदा बिना संसेचन के विकसित होता है:

क. पूर्ण अनिषेक जनन में सब पीढ़ी के व्यक्तियों में अनिषेक जनन पाया जाता है।

ख. चक्रिक अनिषेक जनन में एक अथवा अधिक अनिषेक जनित पीढ़ियों के बाद एक द्विलिंग पीढ़ी आती रहती है।

वैकल्पिक अनिषेक जनन:
इसमें अंडा या तो संसिक्त होकर विकसित होता है या अनिषेक जनन द्वारा।

लिंगनिश्चय की दृष्टि से अनिषेक जनन संपादित करें
लिंगनिश्चय के विचार से अनिषेक जनन तीन प्रकार के होते है:

क. पुंजनन (ऐरिनॉटोकी) में असंसिक्त अंडे अनिषेक जनन द्वारा विकसित होकर नर जंतु बनते हैं। संसिक्त अंडे मादा जंतु बनते हैं।

ख. स्त्रीजनन (थेलिओटोकी) में असंसिक्त अंडे विकसित होकर मादा जंतु बनते हैं।

ग. उभयजनन (डेंटरोटोकी, ऐंफ़िटोकी) में असंसिक्त अंडे विकसित होकर कुछ नर और कुछ मादा बनते हैं।

कोशिकाविज्ञान की दृष्टि से अनिषेक जनन
कोशिकातत्व की दृष्टि से अनिषेक जनन कई प्रकार का होता है:

अर्धक अनिषेक जनन :
अर्धक अनिषेक जनन में अनिषेक जनन द्वारा उत्पन्न जंतु उन अंडों से विकसित होते हैं जिनमें केंद्रक सूत्रों (क्रोमोसोमों) का ह्रास होता है और केंद्रक सूत्रों की मात्रा आधी हो जाती है। यह दो विधि से होता है:

तनू अनिषेक जनन :
तनू अनिषेक जनन में अनिषेक जनन द्वारा उत्पन्न जंतुओं में केंद्रकसूत्रों की संख्या द्विगुण अथवा बहुगुण होती है। यह दो विधियों से होता है:

स्वतस्संसेचक (ऑटोमिक्टिक) :
स्वतस्संसेचक (ऑटोमिक्टिक) अनिषेक जनन में नियमित रूप से केंद्रक सूत्रों का युग्मानुबंध (सिनैप्सिस) तथा ह्रास होता है और केंद्रक सूत्रों की संख्या अंडों में आधी हो जाती है। परंतु केंद्रक सूत्रों की मात्रा, दो अर्धकेंद्रकों (न्यूक्लिआई) के सम्मेलन (फ़्यूज्हन) से पुन: स्थापित (रेस्टिट्यूटेड) केंद्रक के निर्माण अथवा अंतर्भाजन (एंडोमाइटोसिस) द्वारा पुन: बढ़ जाती है।

अमैथुनी (ऐपोमिक्टिक) :
अमैथुनी (ऐपोमिक्टिक) अनिषेक जनन में न तो केंद्रक सूत्रों की मात्रा में ह्रास होता है और न अर्धक अनिषेक जनन अंडों में केंद्रक सूत्रों का युग्मानुबंध और ह्रास होता है। ऐसे अंडों का यदि संसेचन होता है तो वे विकसित होकर मादा बन जाते हैं और यदि संसेचन नहीं होता तो वे नर बनते हैं। इस कारण एक ही मादा के अंडे विकसित होकर नर भी बन सकते हैं और मादा भी। अर्धक अनिषेक जनन का फल इस कारण सदा ही वैकल्पिक एवं पुंजनन (ऐरिनॉटोकस) होता है।
{Post by Mr Sunil}

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सजीवों में लैंगिक जनन की पूरी प्रक्रिया 2021:|The entire process of sexual reproduction in living organisms|sexual reproduction.

सजीवों में लैंगिक जनन की पूरी प्रक्रिया 2021:|The entire process of sexual reproduction in living organisms:

sexual reproduction;

हेलो भाई लोग कैसे हो आप सभी, आज हम सजीवों में लैंगिक जनन की प्रक्रिया के बारे में जानेंगे।

पादपों में लैंगिक जनन?
जीवो में लैंगिक जनन?
निषेचन कैसे होता है?
अंडजनन कैसे होता है?

फूल, पौधों का जनन अंग:

जनन की वह क्रिया जिसमें दो युग्मकों के मिलने से बनी रचना युग्मज (जाइगोट) द्वारा नये जीव की उत्पत्ति होती है, लैंगिक जनन (sexual reproduction) कहलाती है।[1] यदि युग्मक समान आकृति वाले होते हैं तो उसे समयुग्मक कहते हैं। समयुग्मकों के संयोग को संयुग्मन कहते हैं। युग्मनज या तो सीधे पौधे को जन्म देता है या विरामी युग्मनज बन जाता है जिसे जाइगोस्पोर कहते हैं। इस प्रकार के लैंगिक जनन को 'समयुग्मी' कहते हैं।

लैंगिक जनन की प्रक्रिया के दो मुख्य चरण हैं - अर्धसूत्री विभाजन तथा निषेचन (fertilization)।

लैंगिक जनन की उत्पत्ति कैसे हुई, यह एक पहेली है। इस विषय में कई व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं हैं कि अलैंगिक जनन से लैंगिक जनन क्यों विकसित हुआ।

वनस्पतियों में लैंगिक जनन:

मुख्य लेख : पादप प्रजनन
अधिक विकसित पौधों में फल और बीज द्वारा लैंगिक जनन होता है। उनके फूलों में नर गैमीट और मादा युग्मक (गैमीट / Gamete) होते हैं, जिनके सायुज्य से युग्मज (Zygote) बनते हैं। ये बीज के अंदर भ्रूण में विकसित हो, अंकुर बनकर नए पौधों को जन्म देते हैं।

गैमीट बहुत सूक्ष्म और एककोशिकीय होते हैं। लैंगिक जनन में दो विभिन्न जनकों की आवश्यकता होती है। कभी-कभी एक ही प्रकार के दो गैमीट मिलकर जनन करते हैं। ऐसे मिलन का समागम (Conjugation) कहते हैं। दो विभिन्न गैमीटों के मिलने को निषेचन (Fertilization) कहते हैं। शैवाल और कवक सदृश निम्न श्रेणी के पौधों में समागम से जनन होता है और उच्च श्रेणी की वनस्पतियों में निषेचन से। जिन पौधों के गैमीट में नर और मादा का विभेद नहीं होता उन्हें समयुग्मक (Isogametes) कहते हैं और ऐसे पौधों को समयुग्मी (isogamous)। निषेचन में नर और मादा के मिलने से जो बनाता है उसे शुक्रितांड (Oospore), गैमीट को असम युग्मक (heterogamete) और पौधे को असमयुग्मीया या विविधपुष्पी (heterogamous) कहते हैं।

जनन की उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य विधियों, जैसे अजीवाणुजनन (Apospory), अपयुग्मजनन (Apogamy) और असेचन जनन (Parthenogenesis) से भी जनन होता है।

जन्तुओं में लैंगिक जनन :

प्राणियों में लैंगिक जनन की कई विधियाँ हैं, जिनमें प्रमुख विधियाँ हैं-

(1) सामान्य लैंगिक जनन,
(2) उभयलिंगी (Hermaphroditic) जनन,
(3) असेचन जनन (Parthenogenesis) और
(4) डिंभजनन (Paedogenesis)

सामान्य लैंगिक जनन:

सामान्य लैंगिक जनन में दो जन्यु कोशिकाएँ मिलकर एक युग्मज बनाती हैं। दो जन्तुओं की उत्पत्ति दो विभिन्न लिंगों के जनकों में होती है। नर जन्यु को शुक्राणु (Sperm) और स्त्री जन्यु को डिंब या अंडाणु (Ovum) कहते हैं। ये जन्यु विशेष अवयवों अर्थात्‌ जनदों (Gonads) में उत्पन्न होते हैं। नर जनद को वृषण (Testes) और स्त्री जनद को अंडाशय (Ovary) कहते हैं। पूर्वोक्त दोनों जन्युओं के मिलन को संसेचन (Fertilization) कहते हैं। संसेचन के फलस्वरूप युग्मज का निर्माण होता है। युग्मजों के खंडीकरण से भ्रूण बनता है और विकसित होकर शिशु रूप में जन्म लेता है।

वृषण शुक्रजनन नलिकाओं से बना होता है। प्रत्येक नलिका की अंत:भित्ति भ्रूणीय एपिथीलियम (Germinal epithelium) की बनी होती है, जिसके गुणन और विभेदीकरण (differentiation) से शुक्राणु बनते हैं। यह प्रक्रिया तीन क्रमों में होती है। पहला क्रम गुणन अवस्था (phase of multiplication), दूसरा क्रम वृद्धि अवस्था (phase of growth) और तीसरा क्रम परिपक्व अवस्था (phase of maturation) का है। भ्रूणीय एपिथीलियम की सभी कोशिकाएँ निर्माण में सक्षम होती हैं, पर कुछ ही उसमें भाग लेती हैं। ये कोशिकाएँ सूत्रविभाजन द्वारा ज्यामितीय अनुपात में विभाजित होती हैं। विभाजन से बनी कोशिकाओं को शुक्राणु-कोशिक-जन (Spermatogonia) कहते हैं। शुक्राणु-कोशिका-जन बड़े सूक्ष्म होते हैं। इनके अंदर पोषक पदार्थ एकत्रित हेने से ये बढ़ने लगते हैं। ऐसी वर्घित कोशिकाओं को प्राथमिक शुक्राणु कोशिका (Primary spermatocytes) कहते हैं। ये फिर परिपक्व अवस्था में प्रवेश करती हैं। यहाँ प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं का दो बार विभाजन होता है। प्रथम विभाजन अर्धसूत्रण (Meiosis) या ह्रास विभाजन (Reduction division) का है। इस विभाजन के पूर्व प्राथमिक शुक्राणु कोशिक के केंद्रक में उपस्थित क्रोमोसोम (Chromosome) की संख्या द्विगुणित (diploid) होती है, पर अर्धसूत्रण के समय पैतृक क्रोमोसोम अंतर्ग्रंथन (Synapsis) द्वारा जोड़ों में व्यवस्थित हे जो हैं। अंतर्ग्रंथन में कोई दो क्रोमोसोमी जोड़े नहीं बनाते वरन्‌ ऐसे ही क्रोमोसोम जोड़े बनाते हैं जो समधर्मी या समन शक्ति और रचना के होते हैं। इस प्रकार अर्धसूत्रण में पैतृक क्रोमोसोमों की संख्या अगुणित (haploid) हो जाती है। कोशिकाएँ अब द्वितीय शुक्राणुकोशिका हो जाती हैं। द्वितीय शुक्राणुकोशिका का एक बार फिर विभाजन होता है जिसे समसूत्रण (Mitosis) कहते हैं। इससे पूर्वशुक्राणु (Spermatids) बनते हैं, जो धीरे धीरे रूपांतरित होकर शुक्राणु बन जाते हैं।

लाक्षणिक शुक्राणु के तीन भाग - (1) सिर, (2) मध्य खंड या ग्रीवा और (3) पूँछ - होते हैं। विभिन्न शुक्राणुओं के सिर विभिन्न आकार के होते हैं। अधिकांश के अंडाकार, पर किस के छड़नुमा, किसी के कागपेंच से टेढ़े या अन्य प्रकार के भी होते हैं। इनके अग्रिम सिरे पर नुकीला अग्रस्थ भाग या एक्रोसोम (Acrosome) होता है। मध्य खंड प्राय: छोटा और बेलनाकार होता है। पूँछ का अक्षसूत्र (Axial filament) इसी में लिपटा रहता है। पूँछ तंतु के रूप में लंबी और क्रमश: पतली होती जाती है और कशाभ (Flagellum) की भाँति गतिशील होती है। यह शीघ्रतापूर्वक हिलती-डुलती रहती है, जिससे वीर्यद्रव, या जल में तैरकर अंडाणु में प्रवेश करने के लिये शुक्राणु आगे बढ़ता है।

अंडजनन (Oogenesis):

अंडाशय की कोशिकाओं से अंडे (Ova) उत्पन्न होते हैं। अंडे की भी (1) गुणन अवस्था, (2) वृद्धि अवस्था और (3) परिपक्व अवस्था होती है। अंडाशय की कुछ उत्पादक कोशिकाओं के गुणन विभाजन से डिंब कोशिकाजन (Oogonia) बनते हैं। कोशिकाजनों में अंडपीत एकत्र होकर बढ़ते हैं और बढ़कर प्राथमिक डिंबकोशिका (Ocoytes) बनते हैं। इनका फिर से ्ह्रास विभाजन होता है और ये दो अलग अलग कोशिकाओं में बँट जाते हैं। इनमें एक बहुत छोटी और दूसरी बड़ी होती है। छोटी को प्रथम ध्रुवीय पिंड (First polar body) ओर बड़ी को द्वितीय डिंबकोशिका कहते हैं। द्वितीय डिंबकोशिका का सूत्रण विभाजन होती है। यहाँ भी एक छोटी और दूसरी बड़ी होती है। बड़ी को परिपक्व या प्रौढ़ अंडा और छोटी को द्वितीय ध्रुवीय पिंड कहते हैं। प्राथमिक ध्रुवीय पिंडों का भी सूत्रण होकर ध्रुवकोशिका (Polocytes) प्राप्त होती हैं। ध्रुवीय रचनाएँ जनन के काम के लिए बेकार होती हैं।

अर्धभ्रूण या ह्रास विभाजन इस कारण आवश्यक है कि इस प्रकार उत्पन्न जन्युओं के संयोग से जो युग्मज बने उनमें पैतृक सूत्रों की संख्या उतनी ही रहे जितनी उस जाति के लिए आवश्यक है, अन्यथा संतान में पैतृक गुणों के बदल जाने की संभावना हो सकती है। पैतृक सूत्रों की संख्या निश्चित रखने के लिए युग्मज जगक के समय उनका ह्रास विभाजन आवश्यक है।

संसेचन (Fertilization):

डिंब के शुक्राणु से मिलने पर ही नए जीव की उत्पत्ति होती है। जिन प्राणियों में लैंगिक जनन होता है, उनमें डिंब और शुक्राणु दो विभिन्न लिंगवाले प्राणियों में उत्पन्न होते हैं। इनका सायुज्य नर और मादा के मिलकर संभोग करने से होता है। संभोग के समय डिंब और शुक्राणु निकट तो आ जाते हैं, पर शुक्र का डिंब के साथ मिलकर एक हो जाना, अर्थात्‌ डिंब का संसेचन कई बातों पर निर्भर करता है। परिस्थितियों के अनुकूल न होने पर अंडे का संसेचन नहीं होता। संसेचन के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं :

1. शुक्राणु का गतिशील होना - वृषण में शुक्राणु गतिशील नहीं होता, क्योंकि वृषण में थोड़े ही स्थान में असंख्य शुक्राणु रहते हैं। उनसे उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी अधिक होती है कि वे शिथिल रहते हैं, किंतु मैथुन के समय वृषण से निकलकर शुक्रप्रणाली में प्रवेश करने पर वे क्रियाशील एवं गतिशील हो जाते हैं। डिंब तक पहुँचने के लिय शुक्राणु को कुछ दूरी तय करनी पड़ती है और वह दूरी शुक्राणु वीर्य में (जहाँ अंत:संसेचन होता है), या जल में (जहाँ बाह्य संसेचन होता है), तैरकर तय करते हैं, अत: शुक्राणु का गतिशील होना आवश्यक है।

2. डिंब और शुक्राणु कापरिपक्व होना - संसेचन के लिए डिंब और शुक्राणु का परिपक्व होना भी आवश्यक है। किसी किसी प्राणी में डिंब अपरिपक्व अवस्था में स्खलित होता है और ध्रुवीय पिंड (polar bodies) अलग नहीं हुए रहते हैं। ऐसे डिंब के अंदर शुक्र का प्रवेश होने पर प्रथम और द्वितीय ध्रुवीय पिंड अलग हो जाने पर ही संसेचन की विधि पूर्ण होती है। जन्यु जब तक परिपक्व नहीं होते तब तक संसेचन संभव नहीं होता।

3. किसी द्रव माध्यम का होना - जिन प्राणियों में डिंब और शुक्राणु का संयोग जननी के शरीर के अंदर अथवा अंत: संसेचन द्वारा होता है, उन प्राणियों में नर की कुछ विशेष ग्रंथियों में से एक प्रकार के द्रव का स्त्राव होता है, जिसे वीर्य (semen) कहते हैं। इसी द्रव के साथ शुक्राणु मिले रहते हें। वीर्य के माध्यम से शुक्राणु तैरकर, गह्वर द्वार से होकर, डिंबवाही नली (Fallopian tubes) में प्रवेश कर डिंब से संयोग करते हैं। जिन प्राणियों में डिंब ओर शुक्राणुओं का संयोग प्राणी के शर के बाहर होता है, अर्थात्‌ जहाँ बाह्य संसेचन होता है, जैसे मछली और मेढक में, तो ऐसा संसेचन जल में होता है।

4. डिंब और शुक्राणु का एक ही जाति के प्राणी का होना - साधारणतया ऐसा देखा जाता है कि कुत्ते कुतियों से, सांड़ गाय से, मुर्गा मुर्गी से तथा बकरा बकरी से ही संयोग करता है। यदि विभिन्नजातियों के पशुओं का संयोग कराया भी जाए, तो उससे गर्भधारण नहीं होता, क्योंकि एक जाति का शुक्राणु दूसरी जाति के डिंब से संसेचन नहीं कर सकता। यदि किसी प्रकार ऐसा संसेचन कराया भी जाए और उससे संतान भी उत्पन्न हो तो संतान में जनन की क्षमता नहीं रहती। वह नपुंसक होती है।

अंत: संसेचन करनेवाले प्राणियों में अंडों की संख्या बहुत कम होती है और एक बार में एक या कुछ ही संतान उत्पन्न होती है, पर जिन प्राणियों में बाह्य संसेचन होता है, डिंब की संख्या अत्यधिक होती है और अंडों की अपेक्षा शुक्राणुओं की संख्या तो और भी अधिक। जब अंडों और शुक्राणुओं का संयोग जल में होता है, युग्मजों के लिए अनेक बाधाएँ रहती हैं, जैसे जल का ताप, उसकी अम्लता या क्षारीयता, (जल का पीएच मान आदि); जल की धारा की गति (मंद या तीव्र), आसपास के अन्य जलीय प्राणियों की उपस्थिति इत्यादि। अत: स्पीशीज की श्रृंखला बनाए रखने के लिए प्रकृति डिंब और शुक्राणुओं का उत्पादन अधिक संख्या में करती है, क्योंकि इन बहुसंख्यक अंडों ओर शुक्राणुओं में से अनेक अंडे और शुक्राणु उपर्युक्त कारणों में से कोई भी प्रतिकूल कारण हेने पर असंसेचित अवस्था में मर जाते हैं। संसेचन के लिए एक डिंब को एक ही शुक्राणु की आवश्यकता होती है। मनुष्य के एक बार के मैथुन में स्खलित वीर्य में सामान्यत: शुक्राणुओं की संख्या 22,60,00,000 अनुमानित की गई है। इनमें केवल एक ही शुक्राणु डिंब को संसेचित करने का काम करता है। प्रत्येक डिंबोत्सर्ग (Ovilation) में केवल एक ही डिंब डिंबग्रंथि से निकलता है।

ज्यों ही कोई क्रियाशील शुक्राणु अपने ही स्पीशीज के प्राणी के डिंब के संपर्क में आता है त्यों ही वह उसमें प्रवेश कर जाता है। शुक्राणु का सिर तो डिंब के अंदर घुस जाता है, किंतु उसकी पूँछ टूटकर बाहर ही रह जाती है। डिंब में शुक्र प्रवेश कर उसके अंदर अनेक घटनाओं को उत्तेजित करता है। सबसे पहले वह डिंब में किसी अन्य शुक्राणु के प्रवेश को रोकता है। यह काम इस प्रकार होता है 
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22 अक्टू॰ 2020

मानव शरीर के अंग तन्त्र 2023|Human body system2021.

मानव शरीर के अंग तन्त्र 2023|Human body system2023:

हेलो भाई लोगों कैसे हो आप सभी आज हम मानव शरीर के अंग तंत्र के बारे में पढ़ने वाले हैं।

मानव शरीर में कौन-कौन से अंग तंत्र होते हैं?
अंग तंत्र के प्रकार?
पाचन तंत्र क्या है?
स्वसन तंत्र क्या है?
परिसंचरण तंत्र क्या है?
मस्तिष्क?
समन्वय तंत्र क्या है?
उत्सर्जन तंत्र?
रक्त परिसंचरण तंत्र?
प्रजनन तंत्र?
कंकाल तंत्र?


अंग तंत्र अंगों का एक समूह है जो एक कार्य विशेष को अकेले या समूहिक रूप से मिल कर करते हैं। मानव शरीर के विभिन्न अंग तंत्र हैं– पाचन तंत्र, परिसंचरण तंत्र, अंतःस्रावी तंत्र, उत्सर्जन तंत्र, प्रजनन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, श्वसन तंत्र, कंकाल तंत्र और मासंपेशी तंत्र।

इन अंगों के अलग अलग कार्य होते हैं लेकिन ये एक दूसरे से अलग होकर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते हैं| ये मानव शरीर में एक दूसरे से संपर्क में रहते हैं और अपने काम जैसे शरीर में हार्मोन्स के उत्पादन को विनियमित करने, शरीर की रक्षा और गतिशीलता प्रदान करने, शरीर के तापमान को नियंत्रित करने आदि के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

मानव शरीर के तंत्रः  

1. पाचन तंत्रः  

मानव पाचन तंत्र एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें बड़े जैविक तत्वों को छोटे कणों में तोड़ा जाता है जिसका प्रयोग शरीर ईंधन के तौर पर करता है। पोषक तत्वों को छोटे कणों में तोड़ने के लिए मुंह, पेट, आंतों और जिगर में उपस्थित विशेष कोशिकाओँ से निकलने वाले कई एन्जामों के समन्वय की आवश्यकता होती है। मानव पाचन तंत्र के विभिन्न अंगों का क्रम इस प्रकार हैः मुंह, ग्रासनली (भोजन नली), पेट, छोटी आंत और बड़ी आंत। मानव पाचन तंत्र से जुड़ी ग्रंथियां हैं– लार ग्रंथी, यकृत और अग्न्याशय।

पाचन प्रक्रिया में एन्जाइम् महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं औऱ पाचन की क्रिया मुंह में शुरु होती है एवं छोटी आंत में समाप्त होती है। बड़ी आंत में किसी प्रकार का पाचन कार्य नहीं होता है| इसमें उपस्थित जीवाणु विटामिन B और विटामिन K का उत्पादन करते हैं।



2. श्वसन तंत्रः  

भोजन से ऊर्जा निर्गमन करने की प्रक्रिया श्वसन कहलाती है। इसके अंतर्गत कोशिकाओं में ऑक्सीजन ग्रहण करना, उस ऑक्सीजन का इस्तेमाल भोजन को जलाकर ऊर्जा प्राप्त करने में करना और फिर शरीर से अपशिष्ट पदार्थ कार्बन–डाईऑक्साइड और पानी को बाहर निकालना शामिल है।


भोजन + ऑक्सीजन -------> कार्बन डाईऑक्साईड + पानी + ऊर्जा

श्वसन प्रक्रिया में ऊर्जा का निर्गमन शरीर की कोशिकाओं के भीतर होता है। इसके अलावा, जीवन के लिए श्वसन अनिवार्य है क्योंकि यह जीवों को जीवत रखने के लिए अनिवार्य सभी प्रक्रियाओं को करने के लिए ऊर्जा मुहैया कराता है।

बाहरी श्वसन

आंतरिक श्वसन

1. बाहरी श्वसन  फेफड़ों और रक्त में गैसों (O2,CO2) के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है।

1. आंतरिक श्वसन रक्त और कोशिकाओं के बीच गैसों के आदान–प्रदान की प्रक्रिया है।

2. बाहरी श्वसन के दौरान, ऑक्सीजन रक्त में जाता है और CO2 रक्त से बाहर निकलता है|

2. आंतरिक श्वसन के दौरान, रक्त द्वारा ले जाया जाने वाला ऑक्सीजन ऊतकों में जाता है और ऊतकों से CO2 बाहर निकलता है|

3. यह श्वसन का पहला चरण होता है।

3. यह श्वसन का दूसरा चरण होता है।

4. इसमें दो चरण होते हैं– सांस लेना और सांस छोड़ना|

4. इसमें कोई उपचरण नहीं होता है|

5. इस प्रक्रिया में रक्त में ऑक्सीजन बाहरी स्रोतों ( हवा/पानी) से पहुंचता है।

5. इस प्रक्रिया में ऊतक रक्त से ऑक्सीजन अवशोषित करते हैं।

6. इस प्रक्रिया में कार्बनडाईऑक्साइड ऊतक से निकलकर शरीर से बाहर चला जाता है।

6. इस प्रक्रिया में कार्बनडाईऑक्साइड ऊतक से निकलकर रक्त में जाता है।

श्वसन की प्रक्रिया में शामिल हैः शरीर में वायु लेना और बाहर निकालना; ऊर्जा पैदा करने के लिए वायु से ऑक्सीजन का अवशोषण; कार्बन डाईऑक्साइड का निस्तारण जो इस प्रक्रिया में उत्पाद के रूप में निकलता है|

12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों और व्यस्कों में श्वसन की सामान्य दर प्रति मिनट 14 से 18 श्वास होती है।

निःश्वसन: हवा को भीतर की ओर खींचना जिसके कारण वक्ष गुहा के आयतन में वृद्धि होती है।

उच्छ्श्वसन: हवा को बाहर निकलना जिसके कारण वक्ष गुहा के आयतन में कमी होती है।

जैविक विज्ञान में आविष्कार और खोज की सूची

श्वसन के प्रकार:

वायवीय/ऑक्सी श्वसन

अवायवीय/अनॉक्सी श्वसन

1. वायवीय श्वसन में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है|

1. अवायवीय श्वसन की क्रिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होती है|

2. अधिकांश पादप एवं जन्तु कोशिकाओं में वायवीय श्वसन की क्रिया होती है|

2. अवायवीय जीवाणु, यीस्ट की कोशिकाओं, प्रोकैरियोटीज और मांसपेशी कोशिकाओं में अवायवीय श्वसन की क्रिया होती है|

3. वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है| इसमें ग्लूकोज के 1 अणु से ATP के 38 अणु बनते हैं|

3. अवायवीय श्वसन वायवीय श्वसन की अपेक्षा कम प्रभावकारी होता है| इसमें ग्लूकोज के 1 अणु से ATP के 2 अणु बनते हैं|

4. वायवीय श्वसन की क्रिया सामान्यतः माइटोकॉन्ड्रिया में होती है|

4. अवायवीय श्वसन की क्रिया सामान्यतः कोशिका द्रव्य में होती है|

5. वायवीय श्वसन की क्रिया के अंत में उत्पाद के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड और जल प्राप्त होते हैं|

5. अवायवीय श्वसन की क्रिया के अंत में उत्पाद के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड और इथाईल एल्कोहल या लैक्टिक अम्ल प्राप्त होते हैं|

6. वायवीय श्वसन की क्रिया में उर्जा मुक्त होने में अधिक समय लगता है|

6. अवायवीय श्वसन की क्रिया बहुत कम समय में सम्पन्न होती है|

3. परिसंचरण तंत्र :

मनुष्यों में मुख्य परिसंचरण तंत्र 'रक्त परिसंचरण तंत्र' है। परिसंचरण तंत्र को द्वि परिसंचरण तंत्र भी कहा जाता है क्योंकि यह दो फंदों (लूप्स) से बना होता है और रक्त हृदय से होकर दो बार गुजरता है। हृदय इस तंत्र के केंद्र में होता है और दो भागों में बंटा होता है– दायां और बायां।

इस तंत्र में रक्त ऑक्सीजन, पचा हुआ भोजन और अन्य रसायनों जैसे हार्मोन एवं एन्जाइम को शरीर के अन्य हिस्सों में लेकर जाता है। साथ ही यह यकृत कोशिकाओं द्वारा उत्पादित अपशिष्ट या उत्सर्जक उत्पादों जैसे कार्बन डाईऑक्साइड और यूरिया को भी बाहर निकालने का काम करता है।

मानव के रक्त परिसंचरण तंत्र में हृदय (वह अंग जो रक्त को पंप करता है और पुनः प्राप्त करता है) और रक्त वाहिकाएं या नलिकाएं होती हैं जिसके माध्यम से शरीर में रक्त का प्रवाह होता है। रक्त तीन प्रकार की रक्त वाहिकाओं से प्रवाहित होती है:

(i) धमनियां

(ii) नसें और

(iii) केशिकाएं

परिसंचरण तंत्र की रक्त वाहिकाएं मनुष्य के शरीर के प्रत्येक अंग में मौजूद होती हैं। इनके द्वारा ही रक्त शरीर के सभी अंगों तक पहुंचता है।


4. नियंत्रण और समन्वय तंत्र :

उच्च श्रेणी के पशुओं जिन्हें कशेरुकी (मनुष्यों समेत) कहा जाता है, में नियंत्रण और समन्वय तंत्रिका तंत्र के साथ– साथ हार्मोन तंत्र जिसे अंतःस्रावी तंत्र कहा जाता है, के माध्यम से होता है।
   न्यूरॉन कोशिका

तंत्रिका कोशिकाओं से बने तंत्र को तंत्रिका तंत्र कहते हैं और इसका काम हमारे शरीर की गतिविधियों के बीच समन्वय स्थापित करना होता है। इसलिए, यह हमारे शरीर को मिलकर काम करने में मदद करता है। तंत्रिका तंत्र विशेष प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है जिसे न्यूरॉन्स कहते हैं। ये शरीर की सबसे बड़ी कोशिका होती है। तंत्रिका तंत्र के मुख्य अंग हैः मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसें। मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर की सभी इंद्रियों और अन्य अंगों से लाखों नसों से जुड़े होते हैं।


 मानव मस्तिष्क

विभिन्न प्रकार के अंतःस्रावी हार्मोन उत्पादित करने वाले अंतःस्रावी ग्रंथियों के समूह को अंतःस्रावी तंत्र कहते हैं। तंत्रिका तंत्र के साथ मिल कर अंतःस्रावी तंत्र हमारे शरीर की गतिविधियों के बीच समन्वय स्थापित करने में भी मदद करते हैं। हमारे शरीर में मौजूद अंतःस्रावी ग्रंथियां हैं– शीर्षग्रंथि, हाइपोथैलमस ग्रंथि, पिट्यूटरी ग्रंथि, थायराइड ग्रंथि, पाराथायराइड ग्रंथि, थैलमस, अग्न्याशय, अधिवृक्क ग्रंथि, वृषण (सिर्फ पुरुषों में) और अंडाशय (सिर्फ महिलाओं में)|



अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा उत्पादित हार्मोन हमारे शरीर के अंगों और तंत्रिका तंत्र के बीच संदेशवाहक का काम करते हैं।

मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र किस तरह से कार्य करता है?

5. उत्सर्जन तंत्र:

मनुष्यों में, एक अंग तंत्र द्वारा उत्सर्जन का कार्य किया जाता है, जिसे मूत्र तंत्र या उत्सर्जन तंत्र कहते हैं। इसमें निम्नलिखित अंग होते हैं– सेम के बीज के आकार के दो गुर्दे जो पेट के बीच के हिस्से के नीचे और पीछे की तरफ रहते हैं, दो उत्सर्जक नलियां या मूत्रवाहिनियां जो दोनों गुर्दे से जुड़े होते हैं, एक मूत्राशय जिसमें मूत्रवाहिनी खुलती हैं और एक मांसल नली जिसे मूत्रमार्ग कहते हैं जो मूत्राशय से निकलती है। मूत्रमार्ग के अंतिम सिरे पर मूत्रत्याग स्थान होता है। इसके अलावा, उत्सर्जन के दो मुख्य प्रक्रियाएं होती हैं– निस्पंदन और पुनः अवशोषण। दोनों गुर्दे न सिर्फ नाइट्रोजन वाले अपशिष्टों को बाहर निकालने का काम करते हैं बल्कि यह शरीर में पानी की मात्रा को विनियमित (परासरणनियमन– osmoregulation) भी करते हैं और रक्त में खनिजों का संतुलन समान्य बनाए रखते हैं। नेफ्रॉन गुर्दे का संरचनात्मक और कार्यात्मक हिस्सा होता है।

गुर्दे का काम विषैले पदार्थ यूरिया, अन्य अपशिष्ट लवणों और रक्त से अतिरिक्त पानी को बाहर करना और पीलापन लिए तरल मूत्र के रूप में उनका उत्सर्जन करना होता है।


6. प्रजनन तंत्र

एक ही प्रजाति के मौजूद जीवों से नए जीवों की उत्पत्ति को प्रजनन कहते हैं। पृथ्वी पर प्रजातियों के अस्तित्व के लिए यह अनिवार्य है। प्रजनन में जीव अपने माता– पिता के जैसे मूल गुणों के साथ पैदा होता है। जीवों में प्रजनन के दो मुख्य तरीके होते हैं:

(a) अलैंगिक प्रजनन

(b) लैंगिक प्रजनन

अलैंगिक प्रजनन: एकल जनक द्वारा यौन कोशिकाओं या युग्मक के सहयोग के बिना नए जीव को जन्म देना। उदाहरणः अमीबा में होने वाला द्विआधारी विखंडन, हाइड्रा में कोंपल निकला, राइजोपस कवक में बीजाणु का बनना, प्लानारिया (flarworm) में पुनर्जनन, स्पाइरोगाइरा में विखंडन, फूल वाले पौधों (जैसे गुलाब का पौधा) में वनस्पति विस्तार।


  अमीबा का द्विआधारी विखंडन

लैंगिक प्रजनन: दो जीवों, माता–पिता, द्वारा उनके यौन कोशिकाओं या युग्मकों का प्रयोग कर नए जीव को जन्म देना। यौन प्रजनन में शामिल दो जीव नर और मादा होते हैं।

  मनुष्यों में यौन प्रजनन

पुरुष प्रजनन प्रणाली

7. कंकाल तंत्र:

कंकाल तंत्र हड्डियों, उससे संबद्ध उपास्थियों और मानव शरीर के जोड़ों का तंत्र होता है। व्यस्क मानव शरीर में 206 हड्डियां होती हैं। हड्डियों के अलावा कंकाल में कार्टिलेज और लिगामेंट भी होते हैं।

कार्टिलेज सघन संयोजी ऊतक होते हैं जो प्रोटीन फाइबर से बने होते हैं और जोड़ों पर हड्डियों की गतिशीलता के लिए चिकती सतह मुहैया कराते हैं। लिगामेंट रेशेदार संयोजी ऊतक का बैंड है जो हड़्डियों को एक साथ जोड़े रखता है और उनके स्थान पर उन्हें बनाए रखता है। हालांकि जोड़ मानव कंकाल का महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि ये मानव कंकाल को गतिशील बनाता है। जोड़ "दो या अधिक हड्डियों", "हड्डियों और कार्टिलेज" एवं "कार्टिलेज और कार्टिलेज" के बीच हो सकता है।
{Post by Mr Sunil}


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21 अक्टू॰ 2020

श्वसन तंत्र क्या है?|और इसकी कार्यविधि और प्रकार2020|Respiratory system.

 श्वसन तंत्र  क्या है?|और इसकी कार्यविधि और प्रकार2020|Respiratory system.

हां तो  भाई लोग कैसे हो आप सब आज हम पढ़ने वाले हैं स्वसन तंत्र के बारे में।

स्वसन तंत्र क्या है?
स्वसन तंत्र की कार्य विधि?
और स्वसन तंत्र के प्रकार?
स्वसन तंत्र के प्रमुख अंग?
फेफड़े का कार्य?

श्वसन तंत्र :

श्वसन तंत्र या 'श्वासोच्छ्वास तंत्र' में सांस संबंधी अंग जैसे नाक, स्वरयंत्र (Larynx), श्वासनलिका (Wind Pipe) और फुफ्फुस (Lungs) आदि शामिल हैं। शरीर के सभी भागों में गैसों का आदान-प्रदान (gas exchange) इस तंत्र का मुक्य कार्य है।

मुख्य अंग:

नाक (Nose)
सांस लेने के दो रास्ते हैं- एक सही रास्ता दूसरा गलत रास्ता। नाक द्वारा सांस लेना सही रास्ता है किन्तु मुंह से सांस लेना गलत है। हमेशा नाक से ही सांस लेनी चाहिए क्योंकि नाक के अन्दर छोटे-छोटे बाल होते हैं। ये बाल हवा में मिली धूल को बाहर ही रोक लेते हैं, अन्दर नहीं जाने देते। मुंह से सांस कभी नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से हवा (सांस) के साथ धूल और हानिकारक कीटाणु भी अन्दर चले जाते हैं।

सांस-नली (Wind Pipe, Trachea)
यह प्राय: साढ़े चार इंच लम्बी, बीच में खोखली एक नली होती है, जो गले में टटोली जा सकती है। यह भोजन की नली (अन्न नाल) के साथ गले से नीचे वक्षगहर में चली जाती है। वक्षगहर में, नीचे के सिरे पर चलकर इसकी दो शाखाएं हो गई हैं। इसकी एक शाखा दाएं फेफड़े में और दूसरी बाएं फेफड़े में चली गई है। ये ही दोनों शाखाएं वायु नली कहलाती हैं। श्वास नली और वायु नली फेफड़े में जाने के प्रधान वायु पथ हैं।

स्वरयंत्र (Larynx)
स्वरयंत्र या र्लैरिंक्स (larynx), मनुष्यों और अन्य स्तनधारी जीवों के गले में मौजूद एक श्वसन अंग है जिसके प्रयोग से यह जीव भिन्न प्रकार की ध्वनियों में बोल पाते हैं। स्वरग्रंथि के अन्दर बहुत से स्वर-रज्जु (वोकल कार्ड) होते हैं। जब इन स्वर-रज्जुओं के ऊपर से हवा का तेज़ बहाव होता है तब इनकी कंपकंपी से अलग-अलग ध्वनियाँ पैदा होती है, ठीक उसी तरह जैसे किसी सितार की तारों के कंपन से विभिन्न सुरों का संगीत पैदा होता है।

श्वसन तंत्र के प्रमुख अंग:

जीभ के मूल के पीछे, कण्ठिकास्थि के नीचे और कण्ठ के सामने स्वरयंत्र (Larynx) होता है। नाक से ली हुई हवा कण्ठ से होती हुई इसी में आती है। इसके सिरे पर एक ढकंन-सा होता है। जिसे ‘स्वर यंत्रच्छद’ कहते हैं। यह ढकंन हर समय खुला रहता है किन्तु खाना खाते समय यह ढकंन बन्द हो जाता है जिससे भोजन स्वरयंत्र में न गिरकर, पीछे अन्नप्रणाली में गिर पड़ता है। कभी-कभी रोगों के कारण या असावधानी से जब भोजन या जल का कुछ अंश स्वरयंत्र में गिर पड़ता है तो बड़े जोर से खांसी आती है। इस खांसी आने का मतलब यह है कि जल या भोजन का जो अंश इसमें (स्वरयंत्र में) गिर पड़ा है, यह बाहर निकल जाए।

भोजन को हम निगलते हैं तो उस समय स्वरयंत्र ऊपर को उठता और फिर गिरता हुआ दिखाई देता है। इसमें जब वायु प्रविष्ठ होती है तब स्वर उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह हमें बोलने में भी बहुत सहायता प्रदान करता है।

फुफ्फुस (Lungs)
हमारी छाती में दो फुफ्फुस (फेफड़े) होते हैं - दायां और बायां। दायां फेफड़ा बाएं से एक इंच छोटा, पर कुछ अधिक चौड़ा होता है। दाएं फेफड़े का औसत भार 23 औंस और बाएं का 19 औंस होता है। पुरुषों के फेफड़े स्त्रियों के फुफ्फुसों से कुछ भारी होते हैं।

फुफ्फुस चिकने और कोमल होते हैं। इनके भीतर अत्यंत सूक्ष्म अनन्त कोष्ठ होते हैं जिनको ‘वायु कोष्ठ’ (Air cells) कहते हैं। इन वायु कोष्ठों में वायु भरी होती है। फेफड़े युवावस्था में मटियाला और वृद्धावस्था में गहरे रंग का स्याही मायल हो जाता है। ये भीतर से स्पंज-समान होते हैं।

श्वसन क्रिया (Respiration)
सांस लेने को ‘श्वास’ और सांस छोड़ने को ‘प्रश्वास’ कहते हैं। इस ‘श्वास-प्रश्वास क्रिया’ को ही ‘श्वसन क्रिया’ कहते हैं।

श्वास-गति (Breathing Rate)
साधारणत: स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में 16 से 20 बार तक सांस लेता है। भिन्न-भिन्न आयु में सांस संख्या निम्नानुसार होती है-

आयु -- संख्या प्रति मिनट

दो महीने से दो साल तक 35 प्रति मिनट

दो साल से छ: साल तक 23 प्रति मिनट

छ: साल से बारह साल तक 20 प्रति मिनट

बारह साल से पन्द्रह साल तक 18 प्रति मिनट

पन्द्रह साल से इक्कीस साल तक 16 से 18 प्रति मिनट

उपर्युक्त श्वास-गति व्यायाम और क्रोध आदि से बढ़ जाया करती है किन्तु सोते समय या आराम करते समय यह श्वास-गति कम हो जाती है। कई रोगों में जैसे न्यूमोनिया, दमा, क्षयरोग, मलेरिया, पीलिया, दिल और गुर्दों के रोगों में भी श्वास-गति बढ़ जाती है। इसी प्रकार ज्यादा अफीम खाने से, मस्तिष्क में चोट लगने के बाद तथा मस्तिष्क के कुछ रोगों में यही श्वास गति कम हो जाया करती है।

फेफड़े के कार्य:

दोनों फुफ्फुसों के मध्य में हृदय स्थित रहता है। प्रत्येक फुफ्फुस को एक झिल्ली घेरे रहती है ताकि फूलते और सिकुड़ते वक्त फुफ्फुस बिना किसी रगड़ के कार्य कर सकें। इस झिल्ली में विकार उत्पन्न होने पर इसमें शोथ हो जाता है जिसे प्लूरिसी नामक रोग होना कहते हैं। जब फुफ्फुसों में शोथ होता है तो इसे श्वसनिका शोथ होना कहते हैं। जब फुफ्फुसों से क्षय होता है तब उसे यक्ष्मा या क्षय रोग, तपेदिक, टी.बी. होना कहते हैं।

फुफ्फुसों के नीचे एक बड़ी झिल्ली होती है जिसे उर: प्राचीर कहते हैं जो फुफ्फुसों और उदर के बीच में होती है। सांस लेने पर यह झिल्ली नीचे की तरफ फैलती है जिससे सांस अन्दर भरने पर पेट फूलता है और बाहर निकलने पर वापिस बैठता है।

फेफड़ों का मुख्य काम शरीर के अन्दर वायु खींचकर ऑक्सीजन उपलब्ध कराना तथा इन कोशिकाओं की गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाईऑक्साइड नामक वर्ज्य गैस को बाहर फेंकना है। यह फेफड़ों द्वारा किया जाने वाला फुफ्फुसीय वायु संचार कार्य है जो फेफड़ों को शुद्ध और सशक्त रखता है। यदि वायुमण्डल प्रदूषित हो तो फेफड़ों में दूषित वायु पहुंचने से फेफड़े शुद्ध न रह सकेंगे और विकारग्रस्त हो जाएंगे।

श्वास-क्रिया दो खण्डों में होती है। जब सांस अन्दर आती है तब इसे पूरक कहते हैं। जब यह श्वास बाहर हो जाती है तब इसे रेचक कहते हैं। प्राणायाम विधि में इस सांस को भीतर या बाहर रोका जाता है। सांस रोकने को कुम्भक कहा जाता है। भीतर सांस रोकना आंतरिक कुम्भक और बाहर सांस रोक देना बाह्य कुम्भक कहलाता है। प्राणायाम ‘अष्टांग योग’ के आठ अंगों में एक अंग है। प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से फेफड़े शुद्ध और शक्तिशाली बने रहते हैं। फुफ्फुस में अनेक सीमांत श्वसनियां होती हैं जिनके कई छोटे-छोटे खण्ड होते हैं जो वायु मार्ग बनाते हैं। इन्हें उलूखल कोशिका कहते हैं। इनमें जो बारीक-बारीक नलिकाएं होती हैं वे अनेक कोशिकाओं और झिल्लीदार थैलियों के जाल से घिरी होती हैं। यह जाल बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य करता है क्योंकि यहीं पर फुफ्फुसीय धमनी से ऑक्सीजन विहीन रक्त आता है और ऑक्सीजनयुक्त होकर वापस फुफ्फुसीय शिराओं में प्रविष्ठ होकर शरीर में लौट जाता है। इस प्रक्रिया से रक्त शुद्धी होती रहती है। यहीं वह स्थान है जहां उलूखल कोशिकाओं में उपस्थित वायु तथा वाहिकाओं में उपस्थित रक्त के बीच गैसों का आदान-प्रदान होता है जिसके लिए सांस का आना-जाना होता है।
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