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10 दिस॰ 2020

जीव विज्ञान में जंतुओं का वर्गीकरण का वर्णन 2021

जंतुओं का वर्गीकरण:


जंतुओं को मोटे रूप में दो भागों में वर्गीकृत किया गया है:-
1 नॉन कोर्डेटा
2 कॉर्डेटा

1 नॉन कोर्डेटा वर्ग को निम्न भागों में बांटा गया है:
पॉरिफेरा
सीलेंट्रेटा
टिनोफोर
प्लेटी हेमिंथिज
एस्केहैलमिंथिज
ऐनेलिडा
आर्थोपोडा
मोलस्का
इकैनॉडर्मेटा
हेमिकॉर्डेटा

2 कॉडेटा वर्ग को निम्न भागों में बांटा गया है:
पिशीज
एंफिबिया
रिफ्टिलिया
एवीज
मेंमेलिया

आइए जानते हैं सभी वर्गों को detail  से।

पोरिफेरा:

पोरिफेरा उप वर्ग में शामिल किए थे जंतुओं का शारीरिक संगठन कोशिकीय स्तर का होता है।
यह जीव स्थान पर और एकल होते हैं यह समुद्र व अलवणीय जल में पाए जाते हैं ।
इनमें जल परिवहन तथा नाल तंत्र भी पाया जाता है इनका शरीर की सतह पर असंख्य क्षेत्र होते हैं जिन्हें ओस्टिया कहते हैं इन चीजों से ही होकर वायु तथा भोजन शरीर में प्रवेश करता है जल ओस्टिया द्वारा स्पंज गुफा में प्रवेश करता है तथा बड़े रंद्र जिसे ऑस्कुलम कहते हैं द्वारा बाहर निकलता है।
को एनोसाइट या कॉलर कोशिकाएं स्पंज गुफा तथा नाल तंत्र को स्तरीत करती है दी स्तरीय आर्य सममिति पाई जाती है स्तरों के मध्य कैल्शियम कार्बोनेट और स्पोंजइन तंतु का अंत:कंकाल पाया जाता है।
यदि इन जंतुओं में जनन की बात की जाए तो पूरी फेरा वर्ग के जंतुओं में अलैंगिक और लैंगिक दोनों प्रकार की जनन पाए जाते हैं अलैंगिक जनन विखंडन द्वारा होता है इनमें पुनरुदभवन की क्षमता पाई जाती है। लैंगिक जनन युगकों के द्वारा होता है
निषेचन आंतरिक तथा परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।
उदाहरण के लिए साइकस स्पोंजिला युस्पोंजिला आदि आते हैं

सीलेंट्रेटा:

सीलेंट्रेटा वर्ग में आने वाले जंतुओं को नाइडीरिया भी कहते हैं इनमें दंश कोशिका या नायडू ब्लास्ट कोशिका पाई जाती है जो स्परश्क तथा शरीर के अन्य भागों में पाई जाती है।
यह रक्षा करने पर शिकार को पकड़ने में सहायक होती है शारीरिक संगठन उत्तर स्तर का होता है तथा द्ववीकोरकी केंद्रीय जठर संवहनी गुहा उपस्थित होती है जो मुख्य द्वारा खुलती है।
कुछ सदस्य जैसे कोरल ने कैलशियम कार्बोनेट का कंकाल पाया जाता है इसमें दो प्रकार की संरचना पाई जाती है पॉलिप व मेडूसा।
पोलिप स्थावर तथा बेलनाकार होती है उदाहरण हाइड्रा!
मेडूसा छतरी के आकार का मुक्त प्लावी हैं उदाहरण जेलीफिश!
इनमें जनन अलैंगिक प्रकार का होता है जो मुकुलन द्वारा होता है इनमें पुनरुदभवन की क्षमता भी पाया जाती है
उदाहरण पायसेलिया तथा एड्मसिया

टिनोफोरा:

इस उपवर्ग के जंतुओं को समुद्री अखरोट भी कहते हैं।
यह समुद्री ध्वीकोरकी सममिति पाई जाती है तथा उत्तर श्रेणी का शारीरिक संगठन स्तर चयन हेतु पक्ष्माभी कंकत पटिका  पाई जाती है। यह उभय लिंगी होते हैं इनमें लैंगिक और अलैंगिक दोनों प्रकार का जन्म पाया जाता है इनमें बाह्यानिषेचन तथा अप्रत्यक्ष परिवर्तन होता है।
उदाहरण टिनोपलाना प्लुरोब्रंकिया

प्लेटी हेमिंथिज:

इस उप वर्ग में पाए जाने वाले जंतुओं के शरीर चपटे होते हैं इसीलिए इन जंतुओं को चपटे कृमि भी कहते हैं।
अंता परजीवी मनुष्य तथा जंतुओं की आंतों में देहगुहा सहित अन्य स्तरों का शारीरिक संगठन पाया जाता है।
इनमें अंकुश तथा चूशकांक पाए जाते हैं
उत्सर्जन हेतु ज्वाला कोशिकाएं पाई जाती उदय लेंगी निषेचन आंतरिक परिवर्तन में बहुत से लारवा अवस्थाए पाई जाती है।
उदाहरण प्लेन एरिया, फीता कर्मी 

स्केहैलमिंथिज:

इन्हें गोल कर्मी भी कहते है।
इन्हीं सूत्र कर्मी भी कहते हैं।
यह मुक्त जीवी, परजीवी जलीय तथा स्थली होते हैं।
यह जीव एक लिंगी आते हैं नर व मादा अलग-अलग पाए जाते हैं ईद में लैंगिक धविरूपत पाई जाती है।नर आकार में छोटा होता है तथा मादा घर में बड़ी होती है यह अखंड यह होते हैं इनमें अंग तंत्र प्रकार का आहार नाल पाया जाता है इनमें उत्सर्जन प्रोटोनेप्रीडिया के द्वारा होता है तथा तंत्रिका तंत्र में एक तंत्रिका वलाई जिसके अगले कथा अवश्य तंत्रिका निकली होती है जीवन चक्र इन में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रकार का पाया जाता है।
उदाहरण एस्केरिस, वाउचेरिया

ऐनेलिडा:

इस उपवर्ग में आने वाले जीव का शरीर वलयाकार खंडों से बना होता है इनका शारीरिक संगठन अंग तंत्र स्तर का होता है।
इनमें त्रीकोरकी  गुहिय वास्तविक खंडिभवन पाया जाता है।
इसमें बंद प्रकार का परिसंचरण तंत्र पाया जाता है तथा उत्सर्जन, वृक (नेफ्रीडिया) के द्वारा होता है।
अग्र सिरे के पास एक तंत्रिका वलय तथा इसी से जुड़ी तंत्रिका रज्जू उपस्थित होती है।
उदाहरण: एक लिंगी (nereis), उभयलिंगी (केचुआ और जोक)

आर्थोपोडा:

यहां आर्थो का मतलब संधि युक्त होता है तथा 
पोडा का मतलब पाद या पैर होता है।
इस उप वर्ग में आने वाले जीवो में संधि युक्त पेर पाए जाते हैं।
सिर छाती तथा उधर मैं विभाजित वही कंकाल क्यूटिकल का बना हुआ होता है।
इनमें रासायनिक राही स्पर्श ग्राही संवेदांग उपस्थित होते हैं ।
सामान्य तथा संयुक्त नेत्र पाए जाते हैं
वास्तविक देहगुहा उपस्थित पेशीय तंत्र विकसित होता है।
इनमें उत्सर्जन मेलपिगी की नलीकावों के द्वारा होता है।
इनमें खुला परिसंचरण तंत्र पाया जाता है इनका रक्त रंगहीन परंतु कुछ जीवो में हीमोसाइएनिन वर्णक के कारण रक्त का रंग नीला होता है इनमे स्वसन जलीय सदस्यों ने क्लोम या गिल्स के द्वारा होता है इनमें ट्रेकिया या बुक लंग्स के द्वारा स्थल में होता है। इनमें एक लिंगी व लैंगिक विविधता पाई जाती है।
उदाहरण: समस्त कीड़े जैसे मच्छर मछली मक्खी आदि।

मोलस्का:

इस वर्ग में पाए जाने वाले जीवो के शरीर कोमल होते हैं परंतु कठोर कैल्शियम कार्बोनेट के कवच से ढकी होते हैं शरीर अखंडित सिर पैर व  विसरल सरल मास में विभक्त संपूर्ण शरीर मेंटल आवरण से गिरा हुआ मेंटल व शरीर के बीच मेंटल गुहा उपस्थित होती है जलीय जंतुओं में श्वसन फेफड़ों द्वारा स्थली जंतु में फुसफुस द्वारा उत्सर्जन व्रक द्वारा होता है।
यह भोजन को चबाने के लिए रे डोला नाम का विशिष्ट अंग का उपयोग करते हैं इनके सिर पर संवेदी स्पर्श अंग पाए जाते हैं यह एक लिंगी अंड प्रजक होते हैं।
उदाहरण गोंगा ऑक्टोपस कटल सिपिया।

इकैनॉडर्मेटा:

इस ग्रुप वर्ग को समझाने के लिए इसका शाब्दिक अर्थ दिया जहां इकैनोस - कांटे और डर्मा- त्वचा होता है।
इस वर्ग में पाए जाने वाले जंतुओं की त्वचा कांटेदार पाई जाती है तथा समुद्री जीव होते हैं
इनमें जल संवहन तंत्र उपस्थित होता है जो भोजन ग्रहण करने चलने व श्वसन में सहायक होता है।
इनमें अंत: कंकाल कैल्शियम युक्त हड्डियों का बना होता है
इनमें उत्सर्जन तंत्र अनुपस्थित होता है तथा लैंगिक जनन और बाह्य निषेचन पाया जाता है इन में परिवर्तन अप्रत्यक्ष प्रकार का होता है और इनमें पुनरुदभवन की अपार क्षमता पाई जाती है
उदाहरण स्टार फिश समुद्री अर्चिन।

हेमी कॉर्डेटा:

इस उप वर्ग में समुद्री जीव पाए जाते हैं इनकी संरचना क्रमी रूपी होती है शरीर बेलना कार होता है
परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार का पाया जाता है आहर नाली यू आकार का होता है इनमें श्वसन गिल्स द्वारा शोषण होता है
उत्सर्जन सेंड ग्रंथि द्वारा होता है एक लिंगी होते हैं
उदाहरण बलेनोगलॉसस।
 
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(Post by Mr Sunil)
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